शारदीय नवरात्रि के 9 दिनों में नवदुर्गा यानी मां दुर्गा अलग-अलग 9 रूपों की पूजा होती है. चौथे दिन की अधिष्ठात्री देवी कूष्मांडा हैं. इनकी आठ भुजाएं हैं, जिनमें इन्होंने कमण्डल, धनुष–बाण, कमल अमृत कलश चक्र और गदा धारण कर रखा है, इन अष्टभुजा माता के आठवें हाथ में सिद्धियों और निधियों की जप माला है और इनकी सवारी भी सिंह है.
भागवत् पुराण के अनुसार, देवी कुष्मांडा के अंगों की कांति सूर्य के समान ही उज्जवल है। माना जाता है कि देवी कूष्मांडा के प्रकाश से ही दसों दिशाएं प्रकाशित होती हैं। माता कुष्मांडा के स्वरूप की बात करें तो, इनकी आठ भुजाएं हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। माता ने अपने आठों हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, गदा, चक्र और जपमाला धारण किया हुआ है। मां कुष्मांडा का वाहन सिंह है। सृष्टि निर्माण के समय माता कूष्मांडा ने अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ती की इसिलए इनका नाम कूष्मांडा देवी पड़ा।

पुराणों के अनुसार, तारकासुर के आतंक से जगत को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव के पुत्र का जन्म होना जरूरी था। इसलिए भगवान शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया। इसके बाद देवताओं ने देवी पार्वती से तारकासुर से मुक्ति के लिए प्रार्थना की, तो माता ने आदिशक्ति का रुप धारण किया और बताया कि जल्दी ही कुमार कार्तिकेय का जन्म होगा जो तारकासुर का वध करेगा।माता का आदिशक्ति रुप देखकर देवताओं की शंका और चिंताओं का निदान हो गया। इस रुप में मां भक्तों को यह संदेश देती हैं कि जो भी मां कूष्मांडा का ध्यान और पूजन करेगा उसकी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी। यही वजह है कि नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा का विधान है
देवी पुराण के अनुसार, सृष्टि के जन्म से पहले अंधकार का साम्राज्य था। उस समय आदिशक्ति जगदम्बा देवी, कूष्मांडा के रुप में सृष्टि की रचना के लिए जरूरी चीजों को संभालकर सूर्य मण्डल के बीच में विराजमान थी। जब सृष्टि रचना का समय आया तो इन्होंने ही ब्रह्मा विष्णु और शिव जी की रचना की। इसके बाद सत्, रज और तम गुणों से तीन देवियों को उत्पन्न किया जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली के रूप में पूजी जाती हैं। सृष्टि चलाने में सहायता प्रदान करने के लिए ही देवी काली भी प्रकट हुईं। आदि शक्ति की कृपा से ही ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता बने और विष्णु पालनकर्ता, वहीं शिव संहारकर्ता बनें।