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साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में आज “बिहार के प्राचीनतम विश्वविद्यालय” विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित

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बिहार का सबसे पुराना विश्वविद्यालय नालंदा है
• सांची विश्वविद्यालय में विशेष व्याख्यान
• पुरातत्व विभाग के पूर्व निदेशक ने की थी इस साइट पर खुदाई
• मध्य प्रदेश में पुरातत्व महत्व की कई साइट्स हैं- प्रो. वैद्यनाथ लाभ

रायसेन।  साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में आज “बिहार के प्राचीनतम विश्वविद्यालय” विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व निदेशक डॉ. अतुल वर्मा ने अपने व्याख्यान में कहा कि बिहार का प्राचीनतम विश्वविद्यालय बिहार स्थित नालंदा विश्वविद्यालय है। डॉ. वर्मा ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की आर्कियोलॉजिकल साइट्स पर 2009 से 2014 के बीच खुदाई करवाई थी जिसमें कई दीवारें, अवशेष प्राप्त हुए थे।


उन्होंने बताया कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2007 में इस साइट पर खुदाई के आदेश दिए थे। जिसके बाद बोधगया के ताराडीह-तेलहाड़ा में यह कार्य प्रारंभ किया गया। डॉ. वर्मा ने इस साइट पर कई मशहूर हिस्टोरियंस(इतिहासविदों) बीआर मनी, केके मोहम्मद को आमंत्रित किया था। साइट का अध्ययन करने के बाद बीआर मनी ने कहा था कि नालंदा बिहार का प्राचीनतम विश्वविद्यालय है। इसे ‘कुषाण’ व ‘गुप्त’ के बाद ‘पाल’ ने बनवाया था। इसमें कोरिया, जापान, मंगोलिया, तिब्बत व अन्य दक्षिण एशियाई देशों से छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते थे।


डॉ. वर्मा ने साइट पर मिलने वाले अवशेषों के कई फोटोग्राफ्स भी दिखाए। उन्होंने बताया कि नालंदा विवि में हज़ारों की तादाद में छात्र पढ़ते थे और यहां पर 1000 से अधिक बुद्धिस्ट मॉन्क्स(बौद्ध भिक्षु) तथा शिक्षकों के सेल्स(कक्ष) बने पाए गए। उन्होंने बताया कि लाइब्रेरी में पांडुलिपियों को कम तापमान पर रखा जाता था ताकि वो खराब न हो जाएं। इसके लिए लाइब्रेरी की दीवार दो लेयर की बनाई गई थी जिसके बीच से पानी बहता था और इसके कारण अंदर ठंडी हवा आती थी।

सांची विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि मध्य प्रदेश में भी पुरातत्व की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण साइट्स हैं जिसमें रायसेन और विदिशा ज़िले खास हैं। उन्होंने कहा कि सांची विश्वविद्यालय इस दृष्टि से भी एंशियंट हिस्ट्री, कल्चर एंड आर्कियोलॉजिकल हैरिटेज से संबंधित पाठ्यक्रम प्रारंभ करेगा।

उक्त कार्यक्रम में पुरातत्वविद डॉक्टर एच बी ओटा और विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रोफेसर अल्केश चतुर्वेदी भी सम्मिलित हुए।

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