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जैन धर्म के दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन निकली श्रीजी की विमान शोभायात्रा

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-जैन धर्म मे उत्तम क्षमा का बड़ा महत्व
सुरेन्द्र जैन धरसीवा रायपुर
पर्वाधिराज पर्युषण पर्व दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन सांकरा जैन समाज ने श्रीजी की विमान शोभायात्रा निकाली एवं मन्दिर जी मे शांतिनाथ विधान भी आयोजित हुआ जैन धर्म मे उत्तम क्षमा का बड़ा महत्व है।
दस दिवसीय दस धर्मो पर आधारित पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के दौरान दस दिनों तक समाज के लोगो ने एकाशन व्रत किये और श्रीशान्तिनाथ दिगंबर जैन मंदिर जी मे भगवान की भक्ति भाव से पूजन अभिषेक ओर संध्या के समय आरती की गुरुवार को चतुर्दशी के दिन भगवान का मोक्ष कल्याणक भी मनाया ओर निर्वाण लाडू चढ़ाए ।
दोपहर में मन्दिर जी से श्रीजी की विमान शोभायात्रा शुरू हुई जो मुख्य मार्गों से होते हुए वापस मन्दिर जी पहुची जहां श्रीजी का अभिषेक उपरांत नीलेश जैन सह परिवार की ओर से मन्दिर जी मे श्री शांतिनाथ विधान भक्ति भाव से आयोजित हुआ।
उत्तम क्षमा का क्या है महत्व
जैन धर्म मे पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के अंतिम दिन सभी साधर्मी एक दूसरे से जाने अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं और क्षमा करते है
उत्तम क्षमा धर्म का जैनियो में बहुत महत्व है शास्त्रों में पुजन में भी उत्तम क्षमा धर्म की महत्वता को बताया गया है दशलक्षण पूजन में स्प्ष्ट है कि “उत्तम छिमा जहां मन होई अंतर बाहिर शत्रु न कोई’ अर्थात जो मनुष्य अपने मन मे उत्तम क्षमा को धारण किये है उसका कभी कोई शत्रु न संसारी जीवन मे होगा न उसकी आत्मा का कोई शत्रु होगा उत्तम क्षमा को धारण करने वाले ही आत्मकल्याण के पथ पर आगे बढ़ते हैं
क्या हैं दश धर्म
दशलक्षण महापर्व दश धर्मो पर आधारित हैं दशलक्षण पूजन के अनुसार
“उत्तमछिमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं |
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हैं,
चहुँगति दु:ख तें काढ़ि मुकति करतार हैं ||”
यही दश धर्म समाज के लोगो को सदमार्ग दिखाते हैं उत्तम क्षमा धर्म पर पूजन में भी स्प्ष्ट है
‘उत्तम-छिमा गहो रे भाई, इहभव जस परभव सुखदाई |
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहे अयानो”
अर्थत उत्तम क्षमा को धारण करने वाला इस भव में ही नहीं अगले भव में भी सुख पाता है ।

*दश धर्मों का अलग अलग महत्व पूजन में*
उत्तम छिमा जहाँ मन होई, अंतर-बाहिर शत्रु न कोई |
उत्तम मार्दव विनय प्रकासे, नाना भेदज्ञान सब भासे ||
उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुर्गति त्यागि सुगति उपजावे |
उत्तम सत्य वचन मुख बोले, सो प्रानी संसार न डोले ||
उत्तम शौच लोभ-परिहारी, संतोषी गुण-रतन भंडारी |
उत्तम संयम पाले ज्ञाता, नर-भव सफल करे ले साता ||
उत्तम तप निरवाँछित पाले, सो नर करम-शत्रु को टाले |
उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई ||
उत्तम आकिंचन व्रत धारे, परम समाधि-दशा विस्तारे |
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नर-सुर सहित मुकति-फल पावे ||
इस तरह जैन धर्म मे दश धर्मो पर आधारित दशलक्षण पर्व मनाते हुए इन दश धर्मो पर चलने का एक तरह से संकल्प लिया जाता है

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