अपने चहेतों को पुलिस की कार्यवाही में बचाने के प्रयास अब भी जारी.
सुल्तानपुर पुलिस ने 2 आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर जेल भेजा।
लेकिन जांच में अब भी अन्य आरोपियों पर हो सकती है कार्रवाई..!!
विजय सिंह राठौर, रायसेन
रायसेन जिले के बहुचर्चित आदिवासी की फर्जी तरीके से जमीन बेचने के मामले में आखिरकार रायसेन पुलिस ने मामला दर्ज कर ही लिया। आज से करीब 6 महीने पहले सोशल मीडिया पर जमीन को बिकवाने वाले दलाल पत्रकार के लेनदेन का वीडियो वायरल होने के बाद सुर्खियों में यह मामला आया था। जिसके बाद आदिवासी संगठनों और विपक्षी दल कांग्रेस के द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद पुलिस ने जांच के नाम पर 6 महीने यूं ही निकाल दिए । इस पूरे मामले में जमीन के असली मालिक जीवन मुल्ला के फर्जी दस्तावेज तैयार कर बारला निवासी हीरालाल लोधी को जीवन बताकर भोपाल के बिजली कंपनी के अधिकारी आशुतोष गोंड को यह जमीन लाखों रुपए के भाव से भेज दी गई। इस पूरे मामले का मास्टरमाइंड रायसेन का एक दलाल पत्रकार था। जिसने वर्षों से कोली से जमीन जोतने वाले रामविलास आर्य के साथ षड्यंत्र कर इस जमीन को बेचकर रुपयों का बंदरबांट करने का प्लान बनाया था। जिसमें बारला के बुजुर्ग गरीब हीरालाल लोधी को मोहरा बनाकर कुछ पैसे देकर उसे जीवन सिंह बनाकर रजिस्ट्री करा दी गई। इस पूरे मामले में हैरत की बात है यह रही कि जमीन का सौदा होने के बाद नायब तहसीलदार कोर्ट रायसेन में इस गलत तरीके से हुई रजिस्ट्री के आधार पर जमीन का नामांतरण भी कर दिया। इसी बीच आरोपी दलाल पत्रकार और रामविलास आर्य के बीच पैसों के लेनदेन को लेकर एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसके बाद नायब तहसीलदार शिवांगी खरे ने इस पूरे मामले को संज्ञान में लिया और नामांतरण को खारिज कर दिया। जिसके बाद है मामला एसडीएम ओर एडीएम कोर्ट तक पहुंचा और आखिरकार एसडीएम रायसेन ने उक्त मामले में सुल्तानपुर पुलिस को जांच कर विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज करने के निर्देश दिए।

लेकिन एसडीएम के पत्र के बावजूद सुल्तानपुर पुलिस को इस प्रकरण में जांच करने में 6 महीने से ज्यादा का समय लग गया। इस बीच आरोपी पत्रकार और पुलिस के एक बड़े अधिकारी के बीच दोस्ती पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गई। पुलिस अधिकारी ने अपने दोस्ती का फर्ज निभाते हुए जांच में पूरी ताकत लगाते हुए मामले को ठंडे बस्ते डालने का भरसक प्रयास किया। लेकिन बीते हफ्ते कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा जब इस मामले को प्रदेश की मीडिया के सामने उठाया गया तब मजबूरी में पुलिस को दो आरोपियों के खिलाफ धारा 420 सहित अन्य गंभीर धाराओं में मामला दर्ज करना पड़ा। सुल्तानपुर पुलिस ने मामला दर्ज होते ही आरोपी हीरालाल लोधी और रामविलास आर्य को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है । लेकिन इस मामले का मास्टर माइंड आरोपी को अब भी बचाया जा रहा है। 6 महीने चली पुलिस जांच में ना तो इस प्रकरण में वायरल वीडियो को सनलिप्त किया गया और ना ही संदिग्ध आरोपियों के बैंक स्टेटमेंट रिकॉर्ड का मिलान कराया गया। जबकि आरोपी रामविलास आर्य ने रायसेन एसपी को 4 महीने पहले इस मामले में आवेदन देकर उसे फंसाने की बात कही थी। जिसमें उसने साफ-साफ लेनदेन का जिक्र संबंधित आरोपियों के बीच मे किया था। अब हो सकता है कोर्ट में चालान पेश होने से पहले सुल्तानपुर पुलिस इस मामले में अन्य आरोपियों को भी शामिल कर न्यायालय में पेश करें। लेकिन फिलहाल पुलिस की इस कार्रवाई से आदिवासी समाज ने संतोष जाहिर नहीं किया है। पुलिस ने फिलहाल फरियादी आशुतोष गौड़ की रिपोर्ट पर दो आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। जबकि रायसेन एसडीएम कोर्ट के पत्र के मुताबिक पुलिस ने यहा कोई कार्रवाई की हो ऐसा प्रतीत नही होता।

ऐसे मामले में जानकारों की माने तो सरकारी पत्र के आधार पर पुलिस अपनी तरफ से इस मामले में संलिप्त शासकीय कर्मचारियों सहित आरोपियों और दलालों पर मामला दर्ज कर एक ऐसी नजीर पेश करती कि आने वाले दिनों में आदिवासी समाज के साथ हो रहे इस प्रकार के षड्यंत्र पर अंकुश लगाया जा सकता।
फिलहाल एक बड़ा सवाल यह भी है कि फरियादी आशुतोष गौड़ ने अपनी मेहनत की कमाई से इस जमीन की रजिस्ट्री कराई थी जिसके रुपए रामविलास आर्य और दलाल पत्रकार ने मिलकर हड़प लिए। जिन्हें अब पुलिस कैसे वापस करा पाएगी..? वही इस चर्चित मामले को लेकर रायसेन की मीडिया ने पुरजोर आवाज में इस मुद्दे को उठाया था। वहीं इस मामले को रायसेन की मीडिया कहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सामने ना उठाएं उससे पहले ही आनन-फानन में पुलिस ने यह कार्यवाही को अंजाम दे डाला। ज्ञात हो कि आने वाली 7 जून को रायसेन जिले के बम्होरी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लाडली बहना योजना का शुभारंभ करने आ रहे हैं, जहां पत्रकार जिले में इस प्रकार के लंबित मामलों को लेकर उनसे सवाल कर सकते हैं।
इस पूरे मामले में आप भी कई सवाल हैं जो पुलिस की ढीली कार्रवाई पर सवाल खड़े कर रहे हैं। पुलिस ने इस पूरे मामले में तत्कालीन पटवारी हल्का पटवारी को जांच में नहीं लिया। जिसकी भूमिका पर एसडीएम और एडीएम कोर्ट में अपनी जांच में पहले ही संदिग्ध सिद्ध कर दी थी। वही पुलिस ने इस सौदेबाजी के दौरान आरोपियों के मोबाइल कॉल डिटेल पर भी फोकस नहीं किया। जिसमें साफ सिद्ध हो जाता कि इस पूरे षड्यंत्र में कौन-कौन लोग जुड़े हुए हैं। अब आगे देखना होगा अभी क्या पुलिस की कार्रवाई में और भी आरोपी सामने आते हैं या पुलिस के एक स्थानीय वरिष्ठ अधिकारी कि दोस्ती का फल आरोपी को बचाने में सफल हो पाता है।