सागर । मुनि श्री चंद्र सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। धन, भोग और संग्रह बढ़ने के साथ तृष्णा भी बढ़ती जाती है। इसलिए आवश्यकताओं की सीमा तय कर परिग्रह को कम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोक्ष की यात्रा में सांसारिक वस्तुएं साथ नहीं जातीं, केवल कर्म और संकल्प साथ रहते हैं। ज्ञान प्राप्त कर उसे दूसरों में बांटने और लोभ-मोह व कषायों को कम करने का संकल्प लेना चाहिए।
मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज ने कहा कि उत्तम शौच धर्म का वास्तविक अर्थ मन और भावों की पवित्रता है। लोभ, मोह, अहंकार और स्वार्थ से मुक्त होकर ही अंतःकरण निर्मल बनता है। उन्होंने राम-भरत के त्याग और प्रेम का उदाहरण देते हुए बताया कि सच्ची पवित्रता सहज और निस्वार्थ भावों में है।
मुनि श्री ने जबलपुर प्रतिभास्थली का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि बालक देव ने सहज भाव से आचार्य श्री का चित्र बनाकर उन्हें समर्पित किया। आचार्य श्री ने बालक के निर्मल भावों को देखकर उसे आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि चित्र से अधिक महत्वपूर्ण बालक की निष्कपट श्रद्धा थी। मन के विचार और भाव निर्मल हों, यही उत्तम शौच धर्म की सच्ची साधना है।