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दशहरा व दिवाली की बदलती परिभाषा

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सुरेन्द्र जैन

बदलते परिवेश में दशहरा व दीपावली के पावन पर्व को लेकर संस्कृत का एक श्लोक याद आता
“ॐ अस्तो मां सद्गमय तमसो मां ज्योतिर्गमय मृत्योर्मा अमृतम गमय”
अर्थात हे ईश्वर मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो अंधेरे से उजाले की ओर ले चलो मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो
आज यदि हम प्राचीनकाल के महाशक्तिशाली भरत चक्रवर्ती के नाम से प्रसिद्ध भारत या भारत के पहले रहे आर्यवर्त की बात करें रामायण काल की बात करें तो क्या बर्तमान उस दिशा से भटक नहीं गया हे।


श्लोक में भी कहा गया है सर्वप्रर्थम कि हे ईश्वर चमे अंधेरे से उजाले की ओर ले चलो जब हमें अंधेरे से उजाले की ओर जाना है तो हमें यह अधिकार किसने दिया कि हम लाखो करोड़ो असंख्य जीवो के जीवन मे अंधकार करें भारत क्या सारी दुनिया जानती है कि आतिशबाजी से न सिर्फ असंख्य सूक्ष्म जीवो की हिंसा होती है अपितु वायु प्रदूषण से पटाखों के जहरीले पोटाश आदि से मूक प्राणियों पशुधन गौवंश ओर आम इंसानों के लिए भी बीमारियों की उतपत्ति होती है साथ ही खून पसीने से कमाई धन दौलत की फिजूल बर्बादी भी होती है देश का धन विदेशों में ओर हिंसक सामग्री बनाने वालों की जड़े मजबूत भी करता है फिर कैंसे हम बर्तमान में यह कह सकते हैं कि हम अंधेरे पर उजाले या प्रकाश की विजय का उत्सव मना रहे हम तो उल्टा असंख्य जीवो के जीवन मे अंधकार फैला रहे क्या आतिशबाजी से असंख्य जीवो के जीवन मे अंधकार करने में खर्च करने की जगह हम उसी धन को भांरतीय सेना को नहीं दे सकते ताकि वह देश की रक्षा करने वालों के काम आए और देश की रक्षा हो मातृभूमि की रक्षार्थ की जाने वाली हिंसा हिंसा में नहीं मानी जाती लेक़ीन अपने पलभर के मनोरंजन के लिए भांरतीय संस्क्रति के विपरीत जाकर घी के दीपों की जगह आतिशबाजी करना यह प्राणिमात्र के लिए निर्दोष जीवो के लिए मनुष्य जाति व पशु पक्षी परिंदों सभी के लिए घातक है
मर्यादा पुरषोत्तम भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने असत्य पर सत्य की विजय की क्या बर्तमान में सत्य की विजय हो रही है कदापि नहीं जो जितना बड़ा झूठा वो मायाचारी से उतना ही आगे बढ़ रहा जीत रहा झूठ आसमान छूने लगा और सत्य जमी में घुसता जा रहा है और जब असत्य से सत्य की ओर अंधेरे से उजाले की ओर कोई नहीं जा रहा तो अमरत्व की ओर जाने का तो सवाल ही नहीं उठता अमरत्व क्या है अमरत्व अमर करता है अमर मतलब मरकर भी इंसान मरता नहीं अमर हो जाता है क्या झूठ मायाचारी असत्य असंख्य जीवो के जीवन मे अंधकार फैलाकर भी कोई अमरत्व को प्राप्त कर सकता है नहीं कर सकता तो आआख़िर क्यों हमारा देश हमारे देशवासी अपने प्राचीन भारत और प्राचीन भारतीय धर्म संस्क्रति को छोड़कर उसे तोड़ मरोड़कर अपने स्वार्थानुसार बनाकर कुसंस्कृति लाद रहे और संस्कृत के श्लोक के भी विपरीत जा रहे।

दीपावली या आतिशवली
एक ओर जहां लंका विजय के पश्चात मर्यादा पुरषोत्तम भगवान रामचन्द्र जी के अयोध्या वापस आने की खुशी में दीपावली का पावन पर्व मनाया जाता है तो वहीं जैन धर्म मे अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त होने की खुशी में जैन निर्वाण लाडू चढ़ाकर दीपावली की खुशियां मनाते हैं
जब प्रभु श्री राम चन्द्रजी अयोध्या वापस आये तो घी के दीपों से अयोध्या जगमगा उठा अमावश की काली रात भी प्रकाशवान हो गई चहुओर प्रकाश ही प्रकाश वहीं घी के दीपों की ज्योति से वायुशुद्धि ओर असंख्य जीवो के जीवन मे प्रकाश फैला घी के दीपों की ऊर्जा से मनुष्य पशु पक्षी परिंदों सभी को लाभ ही हुआ बैसे भी घी के दीप से नेत्र ज्योति को शक्ति मिलती है ठीक इसी तरह भगवान महावीर स्वामी के निर्वाणोत्सव पर उनके अन्यायी भी निर्वाण लाडू के साथ घी के दीप ओर पुजन आरती भक्ति कर खुशियां मनाये व मनाते हैं जो हर प्राणी के जीवन में प्रकाश फैलाता है
तो क्यों न हम अब ढोंग धतूरों को छोड़कर अपने प्राचीन भारत मे चलें ओर संस्कृत के श्लोक की तरह जीवन बनाएं

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