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लता मंगेशकर : सुरीले सुरों की मूरत के ओझल हो जाने के मायने- उमेश त्रिवेदी

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आलेख

बानवे साल की उम्र में लता मंगेशकर का चले जाना न हैरान करता है, ना ही हतप्रभ करता है। इस घटनाक्रम ऐसा कुछ नही हैं, जिसका एहसास लोगों के पहले से नहीं था या जिसके लिए लोग मानसिक रूप से तैयार नही थे। नियति का यही तकाजा था, जिसे रोक पाना मेडिकल साईंस के सामर्थ्य से बाहर था। इसके बावजूद उनके चले जाने की खबर को दीमाक आसानी से जब्त नहीं कर पा रहा है। एक अजीबोगरीब गुमसुम चुप्पी हमारे जैसे कई लोगों के जहन में बरबस चस्पा हो गई है।
लता मंगेशकर का हमारे बीच सशरीर मौजूद होने के मायने के भिन्न थे। भले ही अर्से से उनकी आवाज खामोश थी, फिर भी उनकी आवाज की अनुगूंज में एक दिव्य और दैविक ऊर्जा थी, जो जिंदगी की धड़कनों को रवानी देती थी, समय के तकाजों को मुस्कराहटट देती थी। घर-आंगन में जब तक मां की आवाज हरकत मे रहती है, तब तक हर व्यक्ति की जिंदगी चहकती रहती है। सभी जानते है कि मां की आवाज के खामोश हो जाने के बाद आंगन कितने भुतहे और सूने हो जाते हैं? ममत्व और प्यार से सराबोर सुरों की प्रतिमूर्ति लता मंगेशकर का ओझल हो जाना घर-आंगन की रौनक को बियबान में तब्दील करने जैसा ही है। उनके असंख्य मुरीदों के दिलों के हालात भी एक अनचाहे सूनेपन की चपेट मे हैं। लोगो के दिलों मे अनवरत बहने वाले सुरों की निर्झर धारा में यह खलल रास नहीं आ रहा है। मन की गहराइयों में गीतों की स्वर-लहरियों के सिलसिला टूट सा रहा है। उनके अनगिनत गीतों के मुखड़ों की तरन्नुम मन की गहराइयों को भिगोने सी लगी है।
कहा जाता है चौबीस घंटे के समय-चक्र में कोई पल ऐसा नहीं होता है, जब लता मंगेशकर की आवाज खामोश होती हो। दुनिया में कंही भी, किसी भी कोने मे लता मंगेशकर के गीतों का कोई रिकार्ड अवश्य बज रहा होता है। भारत की आजादी के बाद जन्में ज्यादातर लोगों की अभिव्यक्तियों ने लता मंगेशकर की सुर-लहरियों के सहारे उड़ाने भरी हैं। उनींदी आंखो से अनगिन मांओ ने उनकी लोरी को गुनगुनाया है, तो भाई-बहनों ने एक-दूसरे की रक्षा की कसमें खाईं है, हरी-भरी वादियों में प्रेमी-जोड़ो ने उनके प्रणय-गीतों के सहारे खुद को अभिव्यक्त किया है, तो आमजनों ने उनके गीतों के माध्यम से वतनपरस्ती का मूल-मंत्र सीखा है। वतन को लोगों ने आंखो मे पानी भरकर शहीदों को याद करने का सबक लता मंगेशकर से ही सीखा है।
जाने-अनजाने लता मंगेशकर अधिकांश भारतीयो के जिंदगी का हिस्सा थीं, जिनके साथ वो आशाओं की परवान चढ़ता था, निराशों से जूझता था, प्रेम-पत्र लिखता था, मां-बेटों के रिश्तों को प्राण देता था, विरहृ-गीतों को गुनगुनाता था, बादलों को उलाहने देता था, कौओं से अतिथियों का पता पूछता था, प्रणय के पलछिनों में चहकता था, सावन के हिंडोलों पर इतराता था, शादियों मे बाबुल की दुआओं को कबूल करता था। लता मंगेशकर अपने गीतों के जरिए आम लोगों की जिंदगी के हर पहलू को भिगोती रही हैं। लोगों की निजता और निजी जीवन में लता का सुरीला हस्तक्षेप एक अदभूत कथानक है, जो अपने आप में शोध का विषय हो सकता है। कवि प्रदीप व्दारा रचित गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों ‘ सुनकर तो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आंखे भर आईं थीं, लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि लता मंगेशकर ने अपने गीतों के जरिए असंख्य लोगों को हंसाया-रूलाया है।
उनकी शख्सियत का कोई भी तकनीकी पहलू अज्ञात नही हैं। लता ने अपनी जिंदगी के सफर में पांच साल रंगमंच किया, साठ सालों तक तीस हजार गीतों के साथ जिंदगी का सफरनामा लिखा और हमसे विदा हो गईं। लता मंगेशकर के जाने के बाद उनके बारे में औपचारिक और अनौपचारिक चर्चाओं का जलजला अथवा तूफान धीरे-धीरे थम जाएगा। जो लोग उन्हें जानते थे या जिन्हे वो जानती थी, उनकी प्रतिक्रियाओं में, बातों में लता मंगेशकर के बखान की औपचारिक परतों की मियाद मीडिया के गलियारों अथवा टीवी स्क्रीन के जरूरतों के हिसाब से छोटी-बड़ी हो सकती है, लेकिन लता मंगेशकर की संगीत-साधना का पक्ष उन्हें शाश्वत बनाता है। चौंसठ कलाओं की व्याख्या में संगीत को सर्वश्रेष्ठ कलाओं में गिना जाता है। इसे श्रेष्ठ इसलिए माना जाता है कि इस विधा में कलाकार और समाज के बीच सीधी संवाद और संप्रेषण होता है। कला और समाज के बीच संगीतमय संप्रेषण को सार्थक और सफल बनाने के लिए अथक साधना की आवश्यकता होती है। शास्त्रों में लिखा है कि चाहे संगीत हो, साहित्य हो, अथवा चित्रकारी, चौंसठ कलाओ में किसी भी कला के सफल सृजन के लिए कलाकार को मन से पवित्र, विशुध्द,निर्दोष, निस्पृह, निर्लिप्त होना जरूरी है। इन सभी शास्त्रोक्क गुणों ने लता मंगेशकर का मस्ताभिषक किया था। शायद इसीलिए वो आमजनों के दिलों में धड़कती थी।


– लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।
– संपर्क : 9893032101

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