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15 करोड़ का ‘शोपीस’ बना सांची स्टेशन! भव्य लोकार्पण के बीच खुली दावों का पोल,बुलेट की स्पीड से निकल जाती हैं ट्रेनें

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  रिपोर्ट – विजय सिंह राठौर रायसेन

एक तरफ करोड़ों के बजट का ढिंढोरा, भव्य वीआईपी मेहमानों का जमावड़ा और दूसरी तरफ अपनी ही किस्मत पर आंसू बहाते स्थानीय लोग व देश-विदेश से आने वाले पर्यटक! यही विरोधाभास आज विश्व धरोहर नगरी सांची के रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला।

‘अमृत भारत स्टेशन योजना’ के तहत करीब ₹15.32 करोड़ फूंक कर सांची रेलवे स्टेशन की सूरत तो बदल दी गई, लेकिन यात्रियों की सीरत वैसी की वैसी ही है। आज, 17 जुलाई को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल की मौजूदगी में सांची सहित 75 रेलवे स्टेशनों का बड़े ही तामझाम के साथ वर्चुअल लोकार्पण किया। बौद्ध वास्तुकला से सजे इस स्टेशन को चमचमाते शेड्स, डिजिटल डिस्प्ले और फैंसी वेटिंग रूम से ‘वर्ल्ड क्लास’ का टैग तो दे दिया गया, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन आलीशान सुविधाओं का इस्तेमाल आखिर करेगा कौन?

सिर्फ 5 ट्रेनों का स्टॉपेज; यात्रियों को ‘मुंह चिढ़ाती’ निकल जाती हैं ट्रेनें!

करोड़ों की भारी-भरकम लागत से रेनोवेट हुए इस स्टेशन की सबसे कड़वी सच्चाई यह है कि यहाँ 24 घंटे में सिर्फ 5 ट्रेनों का स्टॉपेज है! सांची जैसे वैश्विक पर्यटन स्थल पर आने वाले सैलानी और स्थानीय नागरिक दिनभर ट्रेनों के इंतजार में स्टेशन पर माथापच्ची करते रहते हैं, जबकि सुपरफास्ट ट्रेनें उनकी आंखों के सामने धूल उड़ाती और ‘मुंह चिढ़ाती’ हुई धड़धड़ाते हुए निकल जाती हैं। यहाँ ग्वालियर से एक पर्यटक ने बताया कि उसे वापस ग्वालियर जाना है लेकिन पहले उसे उल्टा भोपाल जाना होगा फिर वापस इसी स्टेशन से गुजरते हुए ग्वालियर की ट्रेन से निकला होगा। यह बड़ा टूरिस्ट प्लेस है यहां तो हर ट्रेन का स्टॉपेज होना चाहिए ताकि पर्यटकों एवं स्थानीय लोगों को फायदा मिल सके

लोकार्पण समारोह में ही नेताओं ने दिखाई ‘बेबसी’

स्टेशन की इस बदहाली और जनता के गुस्से का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज मंच पर लोकार्पण की वाहवाही लूटने की जगह स्थानीय विधायक और पूर्व मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी को महामहिम राज्यपाल और रेलवे के महाप्रबंधक (GM) के सामने हाथ फैलाने पड़े। विधायक ने मंच से ही सांची स्टेशन पर अन्य महत्वपूर्ण ट्रेनों के स्टॉपेज बढ़ाने की गुहार लगाई।

पर्यटकों और व्यापारियों के साथ मज़ाक!

एक तरफ प्रशासन दावा कर रहा है कि स्टेशन के इस नए लुक से स्थानीय होटल व्यवसाय, हस्तशिल्प और छोटे व्यापारियों की किस्मत चमकेगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब ट्रेनें रुकेंगी ही नहीं, तो विदेशी सैलानी और बौद्ध श्रद्धालु यहाँ पहुँचेंगे कैसे? बिना ट्रेनों के स्टॉपेज के ₹15 करोड़ की यह चकाचौंध महज एक ‘शोपीस’ बनकर रह गई है। जनता अब सवाल पूछ रही है— क्या विकास सिर्फ दीवारों को रंगने और फीते काटने का नाम है, या आम लोगों को असल सुविधा देना भी इसमें शामिल है।

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