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सहकारी समितियों के कर्मचारी उपेक्षित क्यों? शासन की योजनाओं का बोझ, लेकिन सुविधाएं शून्य

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सी के पारे

केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न  जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सहकारी समितियों के कर्मचारी अहम भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं कर्मचारियों की लगातार उपेक्षा की जा रही है। खाद्यान्न वितरण, समर्थन मूल्य पर उपार्जन, उर्वरक वितरण, बीज उपलब्धता, किसान पंजीयन और अन्य योजनाओं का संचालन जमीनी स्तर पर सहकारी समितियों के माध्यम से ही होता है, परंतु कर्मचारियों को न तो पर्याप्त वेतन मिलता है और न ही स्थायी सेवा सुरक्षा।

मध्य प्रदेश में मध्य प्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ (मार्कफेड) और जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के माध्यम से किसानों से गेहूं-धान खरीदी, उर्वरक वितरण तथा अन्य कृषि योजनाएं संचालित की जाती हैं। इन सभी कार्यों का प्रत्यक्ष दायित्व समितियों के प्रबंधक, सेल्समैन और अन्य कर्मचारियों पर होता है। खरीदी सीजन के दौरान 12-12 घंटे तक काम करने के बावजूद उन्हें ओवरटाइम या विशेष प्रोत्साहन राशि नहीं मिलती।

कर्मचारियों का कहना है कि जब शासन द्वारा नई-नई योजनाएं लागू की जाती हैं तो उनका पूरा दबाव सहकारी समितियों पर डाल दिया जाता है। तकनीकी कार्य, ऑनलाइन पोर्टल एंट्री, किसानों का सत्यापन, भुगतान प्रक्रिया, रिकॉर्ड संधारण—ये सभी जिम्मेदारियां सीमित संसाधनों और कम स्टाफ में पूरी कराई जाती हैं। इसके बावजूद यदि किसी स्तर पर त्रुटि हो जाए तो कार्रवाई का सामना भी कर्मचारियों को ही करना पड़ता है।

सहकारी समितियों के कर्मचारी लंबे समय से वेतन विसंगति दूर करने, नियमितीकरण, सेवा नियमावली लागू करने और सामाजिक सुरक्षा (पीएफ, पेंशन, बीमा) की मांग उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि शासन की योजनाओं को सफल बनाने में उनकी भूमिका को सार्वजनिक मंचों पर सराहा तो जाता है, लेकिन सुविधाओं और अधिकारों के मामले में उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सहकारी ढांचा ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यदि समितियों के कर्मचारी असंतोष में रहेंगे तो योजनाओं के क्रियान्वयन की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। इसलिए आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकार सहकारी कर्मचारियों के लिए स्पष्ट सेवा नीति, वेतनमान और सुरक्षा प्रावधान तय करें, ताकि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।

अब सवाल यह उठता है कि जब शासन की अधिकांश कृषि और जनकल्याण योजनाएं सहकारी समितियों के माध्यम से संचालित हो रही हैं, तो क्या इन कर्मचारियों को भी समान सम्मान और अधिकार नहीं मिलने चाहिए? यह मुद्दा केवल कर्मचारियों का नहीं, बल्कि ग्रामीण व्यवस्था की मजबूती से भी जुड़ा हुआ है।

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