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स्मृति शेष:: प्रखर पत्रकार: श्री अशोक मानोरिया – गोबिंद देवलिया

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मध्यप्रदेश का बंतवांचल, विदिशा सांची का क्षेत्र पौराणिक काल से ही अध्यात्म चेतना, साधना की दिव्य विभूतियों का एवं राजसत्ता का केन्द्र रहा है। महर्षि पतंजलि (गोदर मऊ, जिला रायसेन) पुष्यमित्र शुंग, भगवान शीतलनाथ से लेकर बाबू तख्तमल जैन, रामसहाथ जी, निरंजन वर्मा जी एवं आत्माराम लोकरे शास्त्री जी, विश्वनाथ शास्त्रीजी तथा लल्लू सिंह हैरा, शम्भूदयाल शर्मा ‘विमल’ की कर्मभूमि रहा है। प्रो. प्रीतमबाबू शर्मा, रघुवीरचरण शर्मा और इन सब के बीच, विदिशा के वैभव रूपी मुकुट में हीरे की कनी जैसे सुशोभित ऐसे हमारे, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित” श्री कैलाश सत्यार्थी”

इसी धरती की धड़कन ने, एक प्रखर पत्रकार को, अपने बीच से पत्रकारिता के क्षेत्र में नगर से लेकर प्रदेश स्तर तक कार्य करने, प्रशंसित होने, नेतृत्व करने का अवसर प्रदान किया,श्री अशोक मानोरिया जी के रूप में।

श्री अशोक मानांरिया जी के बारे में कुछ लिखना मेरे लिए प्रसन्नता की बात भी है, और कठिन भी है।

एक राजनैतिक कार्यकर्ता और वो भी जो सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र में भी कार्यरत हों, जब किसी पत्रकार के व्यक्तित्व के बारे कुछ लिखना चाहेगा, तो सबसे पहले अपने प्रति संबंधित पत्रकार के व्यवहार की बात सामने आएगी। इस कसौटी पर श्री मानोरिया बिल्कुल खरे उतरते हैं। उन्होंने कभी भेदभाव नहीं किया और तत्कालीन परिस्थिति अनुसार सभी घटनाओं, व्यक्तियों और कार्यक्रमों को अपने अखबार में समुचित स्थान दिया। क्योंकि वे जानते थे कि तटस्थता-पत्रकारिता में अनिवार्य है।

श्री अशोक मानोरिया से मेरा परिचय बहुत पुराना है।
जब मैं सागर विश्वविद्यालय से अध्ययन कर पारिवारिक परिस्थितिवश विदिशा में सैटल हुआ. विदिशा के पास स्थित ग्राम वन जागीर में हमारी पैतृक जमींदारी है, कृषि है, उसकी ही देखभाल के लिए मुझे विदिशा आना पड़ा। तो अपने समतावादी:समाजवादी रूझान और पत्रकारिता से जुड़ाव के कारण, अग्रज भाई राजकु‌मार जैन के साथ श्री मानोरिया जी से भी मेरा परिचय हुआ। वे दोनों मित्र तो थे ही, साथ ही उन दिनों मानोरिया जी ‘नवभारत’ के साथ ही क्रानिकल (अंग्रेजी) के भी पत्रकार थे और अपने अंग्रेजी डिस्पैच को श्री राजकु‌मार जी को कभी-कभी दिखाने, चर्चा करने, ले आते थे, तो उन्हीं दिनों मेरी उनसे निकटता हुई। बाद में मैंने भी साप्ताहिक अखबार निकाला, और उन्हें इस नाते निकट से जानने का अवसर मिला।

मप्र आंचलिक पत्रकार संघ के बैनर तले हम सभी फिर एकजुट हुए। मानोरिया जी प्रदेश संगठन में थे और में जिला ईकाई का अध्यक्ष। उन्हीं दिनों बिहार प्रेस बिल आया जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतिकूल था। हम सबने उसका प्रतिरोध किया। विदिशा में ऐतिहासिक रैली निकाली। जिसमें पुट्ठामिल के मजदूरों से लेकर बैंक यूनियन, पोस्ट आफिस यूनियन और तृतीय एवं चतुर्थ वर्ग कर्मचारी संगठन के लोग भी सम्मिलित थे। देश-प्रदेश में इसकी सामूहिक खिलाफत के कारण बिहार सरकार को उक्त एक्ट वापिस लेना पड़ा। तब मैंने जाना उन दिनों श्री अशोक मानोरिया को, पत्रकार एवं कुशल संगठक के रूप में। वह ‘नवभारत’ का दौर था और एक पत्रकार के रूप में मानोरिया जी विदिशा में अग्रणी थे।

एक पत्रकार के रूप में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का आंकलन मेरे लिए कठिन है, और मैं इसका अधिकारी भी नहीं हूं, फिर भी इतना कह सकता हूं कि उन्होंने संतुलित पत्रकारिता की है। सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता को अपनी सामर्थ्य और प्रतिभा से, मूल्य निष्ठा से जोड़े रखा है। श्री मानोरिया न केवल कलम के धनी हैं बल्कि उनका सांगठनिक कौशल भी अद्भुत है। उनको करीब से जानने वाले लोग, उनकी एस.ए.टी. आई. प्रशासनिक कर्मटी के सदस्य के नाते किए गए कार्यों से भलीभांति परिचित हैं। इसी तरह सांची के विकास के लिये, प्रथम बार गठित सांची विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) के कार्यकाल में सांची के लिए बनाई गई सुदीर्घ योजनाएं और उन पर क्रियान्वयन की शुरूआत भी उनके प्रशासनिक एवं विकास परक सांगठनिक कौशल का प्रमाण है।

म.प्र. आंचलिक पत्रकार संघ के अध्यक्ष एवं माधवराव सप्रे पत्रकारिता संग्रहालय के अध्यक्ष आदि पदों को भी उन्होंने बखूबी निभाया है और अपने मार्गदर्शक श्री विजयदत्त श्रीधरजी के सपनों को मूर्तरूप देने में उनके कदम दर-कदम हमराही बने हुए हैं।

वर्ष 1982 में उन्हें माखनलाल चतर्वेदी राज्य स्तरीय पुरस्कार तथा वर्ष 2008 में राज्य शासन के शरद जोशी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही अनेक प्रदेश स्तरीय संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों ने भी उन्हें सम्मानित किया है।

हमारे लिए वर्ष, दशक या सदी का अपना एक महत्व है, समय और कालखंड की अपनी महत्ता है, इसी नाते पिछले पांच दशक से पत्रकारिता में सतत क्रियाशील श्री मानोनिया जी पर केन्द्रित इस पुस्तक के प्रकाशन का विचार आया।

समाज के अनेक वर्गों से मानोरिया जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित जो रचनाएं, जैसा कि होता है, श्री मानोरिया जी के व्यक्तित्व के गुणानुवाद का ही वर्णन करती हैं, परन्तु कुछ रचनाकारों ने श्री मानोरिया के मानव स्वभावगत व्यवहार का भी उल्लेख किया है। इन लेखों से श्री मानोरिया के जीवन का वह पक्ष भी उ‌द्घाटित हुआ, जिसका उल्लेख करने में अधिकांश लेखकों ने परहेज किया। इन लेखों के प्रकाशित होने से स्मारिका की पूर्णता को बल मिला है, ऐसा मैं मानता हूँ। विदिशा के पत्रकारिता जगत में, वरिष्ठता के क्रम में भी मानोरिया पहले पायदान पर हैं। पत्रकारिता जगत के अनेक व्यक्ति, उनको भले ही एक विचारधारा से प्रभावित मानते हों, परन्तु अनेक अवसरों पर उन्होंने अपने प्रति, आरोपित इस मिथक को तोड़ने का प्रयास भी किया है। इसी कारण असहमति के होते हुए भी उनके प्रति पत्रकार जगत में आदरभाव बना हुआ है।

श्री मानोरिया जी की पत्रकारिता के 52 वर्ष पूर्ण होने पर हम सब विदिशा के साथियों ने उनका अभिनंदन किया और इस अवसर को स्मरणीय बनाने हेतु मेरे सम्पादन में एक अभिनंदन पुस्तक का प्रकाशन हुआ,,,,,
पुस्तक के प्रकाशन में सम्मिलित सभी लेखकों का मैं हृदय से आभारी हूं, उन्होंने अपने बहुमूल्य समय में से कुछ समय निकालकर श्री मानोरिया जी से जुड़े संस्मरणों, उनके पत्रकारीय अवदान का स्मरण किया, जिससे यह अभिनंदन ग्रंथ सार्थक बन सका। यह ग्रंथ न केवल मानोरिया जी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को प्रकाशित करेगा, वरन समकालीन विदिशा एवं पत्रकारिता के नए आयामों पर भी प्रकाश डालने में सक्षम होगा।

मैं पुनः सभी रचनाकारों, सहयोगी संपादकगणों श्री विजय चतुर्वेदी, श्री देवेश आर्य , श्री अतुल शाह के प्रति आभारी हूं, जिनके सहयोग से ही रचना सामग्री का संकलन एवं प्रकाशन संभव हो सका।

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