-नए मंत्री-मुख्यमंत्री क्या सुनेंगे विद्वानों कि बात?सवाल अब भी बरकरार
भोपाल।सूबे के सरकारी महाविद्यालयों में रिक्त पदों के विरुद्ध पिछले दो दशकों से सेवा करने वाले अतिथि विद्वानों कि समस्याओं का समाधान होता दिखाई नहीं दे रहा है। आलम यह है कि अतिथि विद्वान अब उम्र दराज हो चले हैं पर आज़ तक ना तो उनका भविष्य सुरक्षित हुआ ना हीं फिक्स मासिक वेतन। बस जब चुनावी वर्ष आता हैं तो घोषणा वादे अतिथि विद्वानों के हित में होने लगते हैं लेकिन उन घोषणाओं का आदेश नहीं निकलता औऱ अतिथि विद्वान अपने आप को ठगा हुआ महसूस करने लगते हैं।12 माह कि कांग्रेस सरकार ने जीतू पटवारी के नेतृत्व में नियमितीकरण के लिए नोटशीट बनाई थी तो वहीं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं उस समय के उच्च शिक्षा मंत्री डॉ मोहन यादव महापंचायत बुलाकर फिक्स मासिक वेतन एबं स्थाई समायोजन का बोले थे जो आज़ दिनांक तक पूरी नहीं हुई जिससे अतिथि विद्वान अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहें हैं,जैसा कि विदित हो कि प्रदेश के सभी सरकारी कॉलेजों में अतिथि विद्वानों कि संख्या लगभग 4500 से 5 हजार के बीच है औऱ इन्ही विद्वानों के भरोसे कॉलेज है।
अतिथि विद्वानों का भी नाम बदले सरकार,अतिथि प्रथा होनी चाहिए ख़त्म-महासंघ
जैसे जैसे मोहन सरकार नाम बदल रही है वैसे हीं ये मामला उठने लगा हैं।अतिथि विद्वान महासंघ के प्रदेश मिडिया प्रभारी डॉ आशीष पाण्डेय ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए मंत्री मुख्यमंत्री से निवेदन किया है कि अतिथि विद्वानों का भी नाम बदलें,इतने सम्मानित विभाग उच्च शिक्षा विभाग में अतिथि क्या होता है ये नाम हीं शोषणकारी है,अतिथि कोई दो दिन चार दिन होता हैं 25-26 वर्षों से सरकार अतिथि बनाकर रखी है क्यों??डॉ पाण्डेय ने मुख्यमंत्री,उच्च शिक्षा मंत्री एवं शीर्ष अधिकारीयों से अनुरोध किया कि इस शोषणकारी अतिथि नाम हटाते हुए कोई सम्मान जनक नाम देने कि कृपा करें।
अतिथि विद्वान पीएससी को नहीं मान रहे भविष्य सुरक्षा का हल
सरकारी कॉलेजों में पीएससी के द्वारा भर्ती का विज्ञापन जारी किया जा चुका है जिसको अतिथि विद्वान विरोध कर रहे हैं.महासंघ के महासचिव डॉ जेपीएस चौहान ने कहां कि 55-60 वर्ष तक के अतिथि विद्वान हो गए हैं सब नेट पीएचडी है 26 वर्षों का अनुभव हैं अब इनकी कैसी परीक्षा औऱ ना हीं ये फॉम भरने के पात्र है।डॉ चौहान ने बताया कि अतिथि विद्वान हीं कॉलेजों के समस्त कार्य करते हैं योग्यता है अनुभवी हैं फ़िर भी भविष्य सुरक्षित नहीं,सरकार दृढइक्षा सक्ति दिखाए एवं अतिथि विद्वानों का भविष्य सुरक्षित करे।
इनका कहना हे –
पूर्व सरकारों ने जो किया तो किया अब बारी नए मुख्यमंत्री,मंत्री एवं शीर्ष अधिकारीयों कि हैं कि वो अतिथि विद्वानों का हित कितना चाहते हैं.अगर वास्तव में शासन प्रशासन संवेदनशील है तो दृढ़ इक्षा शक्ति दिखाते हुए अतिथि विद्वानों को फिक्स मासिक वेतन एवं स्थाई /समायोजन करे। हरियाणा कि भाजपा सरकार ने भी अतिथि विद्वानों को नियमित किया है अब बारी मध्य प्रदेश सरकार कि हैं।
-डॉ देवराज सिंह,प्रदेश अध्यक्ष