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कैमूर की पहाड़ियों में मिले 12 हजार वर्ष पुराने विश्व के पहले देवी उपासना स्थल

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जबलपुर। क्या जगत जननी मां के रूप में सबसे पहले ईश्वर की आराधना हुई। लगभग बारह हजार वर्ष पुराना दुर्लभ उपासना स्थल विंध्य की कैमूर की पहाड़ियों में हैं। उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे सीधी जिले के सिंहावल के समीप कैराई, बघोर एवं मेधौली इन तीन गांवों में स्थित विश्व के पहले मानव निर्मित उपासना स्थल मिलते हैं । खुले चबूतरों पर स्थित इन देवी स्थलों का प्रत्येक पत्थर रहस्यमय शक्ति पुंज समेटे प्रतीत होता है। प्रत्येक चबूतरे पर बारह हजार वर्ष पहले पत्थरों पर बारीकी से उकेरी हुई त्रिकोण की आकृति पहली नजर में ही आकर्षित करती है।

पश्चिमी लेखकों में जान मुइर ने सन् 1870 में अरण्यानि देवी का अध्ययन किया था

कैमूर के ये स्थल प्रतीकों की वैश्विक जन्मस्थली के रूप में भी सामने आते हैं। ऋग्वेद के दसवें मंडल के एक सौ छियालीसवें सूक्त की अरण्यानि देवी के वर्णन से इनकी समरूपता प्राप्त होती है, अरण्यानि अर्थात वन देवी। ग्रामीण द्वारा इन देवीस्थलों की अधिष्ठात्री को जिस प्रकार से वनसती के नाम से जाना जाता है, उससे इस तथ्य की पुष्टि हो जाती है। पश्चिमी लेखकों में जान मुइर ने सन् 1870 में अरण्यानि देवी का अध्ययन किया था।

इस स्थलों का दो बार अध्ययन एवं मूल्यांकन कर चुके

इंडोलाजिस्ट ललित मिश्र कहते हैं कि इस स्थलों का दो बार अध्ययन एवं मूल्यांकन कर चुके हैं। अपर पैलियोलिथिक युग की ये भारत के एकमात्र साइटस हैं जिनमें आस्था के प्रमाण मिले हैं, जिनके सुरक्षा एवं संरक्षण की तुरंत आवश्यकता है। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य सबसे प्राचीन उपासना स्थलों में तुर्की स्थित गोबेक्ली टेपे एवं लंदन स्थित स्टोनहेंज क्रमशः पहले एवं दूसरे नंबर पर आते हैं, तीसरे एवं चौथे नंबर हेतु इजिप्ट के पिरामिड एव चीन के शान्तुग प्रांत में स्थित ताई-शान, अपना अपना दावा करते हैं, किंतु इन सबको पछाड़ते हुये कैमूर का बघोर गांव में बघोर -1 के नाम से चिह्नित देवी स्थल पहले नंबर पर दावा पेश करता है।

भारत में मंदिर निर्माण गुप्त साम्राज्य अर्थात चौथी शताब्दी केआस-पास प्रचलित हुआ था

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि इसके पहले भारत का कोई मंदिर या अन्य धार्मिक स्थल फिलहाल वैश्विक स्तर पर प्रचीनता के पैमानों पर अपना स्थान नहीं बना सका। इतिहास की किताबों में काफ़ी लंबे समय तक यही लिखा गया कि भारत में मंदिर निर्माण गुप्त साम्राज्य अर्थात चौथी शताब्दी केआस-पास प्रचलित हुआ था इस प्रकार मंदिरों की प्राचीनता सोलह-सत्रह सौ वर्षों तक सीमित रह जाती है। कहने का अर्थ यह कि प्रचलित इतिहास की दृष्टि में बौद्ध स्तूप सनातन मंदिरों की तुलना में अधिक प्राचीन ठहरते हैं क्योंकि प्रचीन मंदिरों की विधिवत वैज्ञानिक डेटिंग आज तक नहीं हो पाई है।

कितने प्राचीन हैं कैमूर के देवीस्थल

ललित मिश्र बताते हैं कि बघोर-1 एवं बघोर-2 की उपलब्ध कार्बन डेटिंग के आधार पर कैमूर के इन तीन गावों में स्थित देवी स्थलों की प्राचीनता लगभग 8300 वर्ष से 11,800 वर्ष के बीच आती है। यह प्राचीनता अब से चालीस वर्ष पूर्व बगैर कैलीबरेशन की कार्बन डेटिंग पर आधारित है, जिसका के बाद और आगे बढ़ना तय है। तुर्की के गोबेक्ली टेपे की प्राचीनता 10,500 वर्ष से 11,500 वर्ष के बीच मानी जाती है, इस प्रकार गोबेक्ली टेपे की तुलना में कैमूर के देवीस्थल 300 वर्ष से 500 सौ वर्ष अधिक प्राचीन सिद्ध होते हैं।

चालीस वर्ष पूर्व हुआ अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण

सन 1982-83 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. जीआर शर्मा के साथ कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले की टीम के प्रो. जेडी क्लार्क के नेतृत्व में इन स्थलों का सर्वेक्षण किया था। टीम ने रिसर्च जरनल एंटीक्विटी में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की, किंतु वह प्रयास समय के अंधेरे में लुप्त हो गया। मेधौली गांव में अस्सी वर्ष के वृद्ध ब्रह्मदेव सिंह से मुलाकात हुई जिन्होंने सन् 1982-83 में किए गए सर्वेक्षण में काम किया था, उन्होंने बताया कि बर्कले से आया हुआ दल प्रतिदिन पांच रुपये की दर से काम कराता था।

उपेक्षा क्यों हुई

इतनी प्राचीनता के बावजूद भारतीय इतिहासकारों द्वारा की गई उपेक्षा की वजह से अपने महत्व से वंचित रह गये ये देवीस्थल। उदाहरण के तौर पर रोमिला थापर ने प्राचीन भारत पर लिखी किताब में एक लाइन में फ़र्टिलिटी कल्ट बताकर खानापूर्ति कर दी। उपिंदर सिंह ने वर्णन तो ठीक किया किंतु भारतीय संस्कृति से जोड़कर नहीं देखा ।

ग्रामीणों के मन में इन स्थलों को लेकर अगाध श्रद्धा

ग्रामीणों को इन स्थलों के महत्व का आभास है, उनमें उत्साह और चेतना भी है। एक ग्रामीण समयलाल प्रजापति भावविभोर होकर बघोर से लौटते हुये अकस्मात स्वतः कहने लगे कि अंग्रेजों ने हमारे वेद पुराण भ्रष्ट कर दिये, हमारा सोना लूट लिया नहीं तो हमारा भारत किसी से कम नहीं था जिससे इन प्राचीन देवीस्थलों के महत्व की पुनर्स्थापना हेतु किया जा रहा प्रयास सार्थक लगा ।

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