धीरज जॉनसन, दमोह
दमोह शहर से लगभग 20 – 22 किमी दूर स्थित ग्राम बहेरा के हालात बरसात में ऐसे हो जाते हैं जैसे किसी साहसिक शो की शूटिंग चल रही हो,जहाँ स्क्रिप्ट में नाला पार करो, जान बचाओ, वाला सीन बार-बार दोहराया जाता है।
करीब 400 की आबादी वाले इस गांव से मुख्य सड़क तक जाने के लिए कच्चा रास्ता तो है, लेकिन बीच में एक नाला है, जिस पर रपटा बना हुआ है परंतु बरसात के समय इसके ऊपर से पानी बहता है, मजबूरी में ग्रामीण बांस, ट्यूब और लकड़ी से नाव बनाकर, दोनों किनारों पर रस्सी बांधकर, “रोप-वे बोट सर्विस” चला लेते है,बिना लाइफ जैकेट और बिना टिकट। यह रोमांचक यात्रा देखने में फिल्मी लग सकती है, पर ज़रा सा हाथ फिसला तो सीधा पानी के हवाले।
दूसरा कच्चा रास्ता भी है, लेकिन उसकी दूरी ज्यादा है और बरसात में वहाँ गड्ढे और जलभराव ऐसे स्वागत करते हैं कि स्वस्थ भी बीमार हो जाए।
ग्रामीण कई बार मांग उठा चुके हैं कि एक पक्का पुल या सड़क बनाई जाए, लेकिन जिम्मेदार विभाग शायद मानकर बैठा है कि बहेरा के लोग ‘एडवेंचर टूरिज़्म’ का आनंद ले रहे हैं, इसलिए बदलाव की कोई जल्दी नहीं है।कहने को तो ये 21वीं सदी है, लेकिन बहेरा में बरसात आते ही घड़ी की सुई मानो आज़ादी से पहले के दौर पर लौट जाती है—बस फर्क इतना है कि अब कैमरे वाले मोबाइल हैं, ताकि मुसीबत का वीडियो भी वायरल हो सके।