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सांची विश्वविद्यालय में हिंदी पखवाड़ा में काव्य पाठ समारोह

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• छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों और कर्मचारियों ने सुनाई कविताएं
• ढपली की थाप पर काव्य पाठ का आनंद उठाया श्रोताओं ने
• 24 से 30 सितंबर तक चलेगा हिंदी पखवाड़े का कार्यक्रम

रायसेन।  साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में हिंदी पखवाड़े के तहत कविता पाठ का आयोजन हुआ। छात्रों के साथ-साथ कर्मचारियों और शिक्षकों ने भी अपने काव्य कौशल को प्रस्तुत किया। छंद, ताल, लय और सुर में कविताएं, गीत प्रस्तुत किए गए।

बौद्ध दर्शन विभाग से कुमारी शिखा ने “गौतम बुद्ध” पर कविता पढ़ी, अविनाश ने प्रेम और वियोग पर स्वरचित कविता लड़के कभी रोते नहीं पेश की। कमलेश अहिरवार ने “मां” पर सुनाया कि ‘प्यार भरे हाथों से हमेशा थकान मेरी मिटाती है मां, लफ्जों से जिसे बयां किया जा न सके ऐसी होती है मां, सुनाई।

शुभम महेश गजभिये ने गजल सुनाई खामियां तो मुझमें थी लाखों मगर, चेहरा भी अपना किरदार होना चाहिए। योग विभाग की ज्योति सल्लाम ने “ज़िंदगी” विषय पर कविता केंद्रित की तो वैदिक दर्शन विभाग की रक्षा सिंह बघेल ने “चराचर जगत” पर काव्य पाठ किया। भारतीय दर्शन विभाग के आभाष आर्य ने विष्णु सक्सेना की श्रंगार रस की कविता को बखूबी लय बद्ध कर प्रस्तुत किया। आभाष ने कुछ हास्य-व्यंग भी सुनाए जिसका दर्शकों और श्रोताओं ने भरपूर आनंद लिया।


वैकल्पिक शिक्षा विभाग के छात्र नरेंद्र लोधी की कविताओं और शेरों ने भी खूब सराहना बटोरीं। नरेंद्र ने सुनाया कि खुद को इश्क तुम्हे वफा लिख दूं क्या, मेरे नाम के साथ तेरा नाम हर दफा लिख दूं क्या। हमेशा रहते हो जहन में पूछ लो, जो मेरा है वहीं तुम्हारा भी पता लिख दूं क्या। यूं तो कारवां है मेरा, जिससे मिला मुरीद बना मेरा, पर जिससे मिन्नतें की, वो शख्स मुझसे मिला ही नहीं। अंग्रेज़ी विभाग की छात्रा सिमरन यादव ने भी वर्तमान दिनों भारत के अलग-अलग राज्यों में हो रही अनैतिक घटनाओं पर आधारित कविता प्रस्तुत की। उन्होने सुनाया कि ‘तुम्हारी चुप्पी पर तो सवाल होंगे, बोलोगी भी तो बवाल होंगे। तुम हिम्मत हारना नहीं, शक्ति कम आंकना नहीं, तुम रणचंडी बन आखिर तक इन्हें छोड़ना नहीं।‘ हिंदी विभाग की स्वाति सल्लाम ने जंगलों और उससे जुड़े जनजीवन को बचाए जाने की आवाज़ अपनी कविता प्रकृति की पुकार सुनाई। छात्रा मोनिका धाकड़ ने भी अपनी रचना प्रस्तुत की और मंच संचालन किया।


छात्रों के काव्य कौशल से प्रभावित होकर विश्वविद्यालय के कर्मचारी छत्रपाल सिंह ने गृहणी और उसके भाव पर कविता केंद्रित की। डॉ. रितु श्रीवास्तव ने भी देश के आम व्यक्ति की हालत को अपनी कविता “ईंट की भट्टियां” के ज़रिए सुनाया कि दिखती नहीं है आग पर जल रही है ये जिंदगी, तपिश में खड़ी है गीली चार आंखे। योग विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. उपेंद्रबाबू खत्री ने भी ढपली की थाप पर खूब वाह-वाही लूटी। प्रो. नवीन कुमार मेहता ने अपनी कविता “सब मुमकिन है” तथा अपने लिखे एक देवी गीत को प्रस्तुत किया। डॉ. राहुल सिद्धार्थ ने भी अपना काव्य प्रस्तुत करते हुए सुनाया कि – जिंदगी के तमाम फलसफों के बीच, आखिर में रह जाएगी थोड़ी सी उम्मीद। इन तमाम साजिशों के बीच, बची रह जाएगी एक दूसरे के लिए थोड़ी सी हमदर्दी। लेकिन इन तमाम फलसफों के बीच जो कुछ नहीं बचेगा तो वो है हम। हिंदी पखवाड़ा विश्वविद्यालय में 24 से 30 सितंबर तक आयोजित है।

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