रेड ग्रीन सिग्नल: सौगात के साथ मुसीबत फ्री, ठंड हो या गर्मी या फिर बरसात हर मौसम में ब्रिज का नजारा वर्षा जैसा
रेलवे ने आम जनता को सौगात के साथ मुसीबत भी दे दी है। सुनकर अटपटा जरूर लग रहा होगा। पर यह सच है। जी, हम बात कर रहें हैं उस अंडरब्रिज की, जिसके लिए लोगों को सालों इंतजार करना पड़ा। सालों तक मांग व विरोध के बाद आखिरकार रेल प्रशासन ने सुविधा तो दे दी। साथ में ऐसी परेशानी उपलब्ध करा दी है, जिसके कारण इस ब्रिज से राहगीरों का गुजरना मुश्किल हो गया है।
ठंड हो या गर्मी या फिर बरसात हर मौसम में ब्रिज का नजारा वर्षा के सीजन की तरह रहता है। लोग परेशान हैं और यही सोच रहे हैं कि उन्होंने ऐसी सुविधा की मांग कतई नहीं की थी। हालांकि इस दिक्कत की वजह तकनीकी फाल्ट ही है। अब प्रश्न यह उठता है कि इसे दूर करने में रेल प्रशासन रुचि क्यों नहीं ले रहा है? सौगात के साथ रेलवे ने परेशानी भी उपलब्ध करा दी है।
साहब के चेंबर में हाजिरी
रेलवे के एक छोटे साहब इन दिनों सुर्खियों में हैं। सुर्खियां इस बात को लेकर नहीं है कि वह काम के संवेदनशील है। बल्कि, इसलिए क्योंकि बेवजह उनके चेंबर में हाजिरी देनी पड़ती है। एक कर्मचारी दिन में चार से पांच बार उपस्थिति दर्ज नहीं कराता है तो उसे बाद में नाराजगी का सामना करना पड़ता है।
दरअसल साहब चाहते हैं कि पूरे समय उनकी कुर्सी के आगे कर्मचारी फाइल लेकर मौजूद रहें, ताकि जब कोई उनके चेंबर में पहुंचे तो उन्हें यह लगे कि साहब व्यस्त हैं और उनके पास काम का दबाव है। हकीकत इसके ठीक विपरीत है। एक तो साहब में खुद से निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है। यदि कर्मचारी सुझाव दे तो वह घबरा जाते हैं। उन्हें इस बात का डर सताने लगता है कि सुझाव पर अमल करने का आदेश देते हैं और वह गलती से गलत निकला तो उनके मत्थे मुसीबत आ जाएगी।
क्या हुआ साहब का वादा
बड़े साहब जब नए थे तब उन्होंने वाहवाही बटोरने के लिए आम जनता से ऐसा वादा कर दिया जो कतई संभव नहीं था। चूंकि साहब कह चुके थे, इसलिए उनके आदेश का पालन भी हुआ। ट्रेनों के रद होने का सिलसिला पूरी तरह थम चुका था। आम जनता में इस बात की खुशी थी।
लेकिन, रेलवे में किसी भी आदेश का कितनी गंभीरता से पालन होता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
समय गुजरने के साथ ही साहब के आदेश शिथिल हो गए और अब स्थिति पहले जैसी हो गई है। ट्रेनें थोक में रद हो रही हैं और यात्रियों को इसकी वजह से परेशानी भी हो रही है। कुछ यात्री तो इंटरनेट मीडिया में यह लिख चुके हैं कि क्या हुआ साहब का वादा। वादा किया तो निभाना पड़ेगा। हालांकि आम जनता के इस सवाल का जवाब संबंधित साहब तो दूर किसी भी अधिकारी के पास नहीं है।
इस चेंबर के कौन साहब
रेलवे में एक ऐसा भी कार्यालय है जो है तो बड़ा लेकिन, व्यवस्था छोटे-छोटे कार्यालय से भी कम हैं। आलम यह है कि एक चेंबर में पांच से छह कुर्सियां व टेबल जमे हुए हैं। जब कोई निजी व्यक्ति किसी काम के सिलसिले में पहुंचता है तो कुछ पल के लिए भ्रमित हो जाता है कि आखिर इस चेंबर के साहब कौन हैं? किनसे उन्हें मिलकर कामकाज को पूरा कराना है। यह स्थिति जब से कार्यालय अस्तित्व में आया है, तब से है।
हालांकि नए दफ्तर को लेकर अब तक जितनी जद्दोजहद करनी चाहिए थी, उससे कही ज्यादा कर चुके हैं। लेकिन, जिस संस्था के अंतर्गत वह आते हैं, वह उनकी सुनती ही नहीं है। एक चेंबर में छोटे-बड़े अधिकारियों की उपस्थिति के कारण कामकाज पर इसका विपरीत असर पड़ता है। इसके अलावा गोपनीय बातें करने के लिए हर थोड़ी-थोड़ी में देर में उठकर अधिकारी और कर्मचारियों को बाहर जाना पड़ता है।