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मप्र डायरी: राजनीति का नया कुरुक्षेत्र मालवा और भाजपा की दिशा-दशा-अजय बोकिल

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आलेख
अजय बोकिल

मप्र की राजनीति में यह अभूतपूर्व संयोग है कि अब राज्य का मुख्यमंत्री, एक उप मुख्यमंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष भी मालवा अंचल से ही है। यानी मालवा अब प्रदेश की राजनीतिक महाभारत का नया कुरुक्षेत्र है। जो मालवा पर काबिज होगा, वह भोपाल में सत्तासीन होगा।

हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में से एक और लोकसभा सीटों के लिहाज से भी तीसरे बड़े राज्य मध्यप्रदेश में दोनो प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन की सियासत अब दिलचस्प मोड़ में है।
मप्र में विधानसभा चुनाव में बंपर जीत के बाद सत्तारूढ़ भाजपा अब पूरे घर के बदल डालने की तर्ज पर काम रही है तो इसके जवाब में कांग्रेस ने भी अपने सभी मुख्य सिपहसालार ताबड़तोड़ बदल दिए हैं। मोटे तौर पर बदलाव का यह फार्मूला फ्रेश चेहरों को आगे लाने, जातीय व क्षेत्रीय समीकरण साधने और आने वाले कम से कम एक दशक राजनीति कर सकने वालों को कमान सौंपने की नीयत से लागू किया गया है।
खास बात यह है कि दोनों ही पार्टियों ने इस बार राज्य के अपेक्षाकृत समृद्ध और प्रगत क्षेत्र मालवा अंचल को केन्द्र में रखा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि सत्ता का रास्ता इसी अंचल से गुजरता है।


मप्र की राजनीति में यह अभूतपूर्व संयोग है कि अब राज्य का मुख्यमंत्री, एक उप मुख्यमंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष भी मालवा अंचल से ही है। यानी मालवा अब प्रदेश की राजनीतिक महाभारत का नया कुरुक्षेत्र है। जो मालवा पर काबिज होगा, वह भोपाल में सत्तासीन होगा।

चुनावी नजरिए से मप्र की सियासत
मध्यप्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं। इनमें से 8 अकेले मालवा से हैं और इसी क्षेत्र में विधानसभा की 50 सीटें हैं। इनमें अगर निमाड़ को भी जोड़ लिया जाए तो ये संख्या लोकसभा की 10 और विधानसभा की 66 सीटें होती हैं। इस बार बीजेपी ने 66 में से 48 सीटों पर जीत हासिल कर कांग्रेस को बहुत पीछे ठेल दिया है।
भाजपा ने अपना नया मुख्यमंत्री जिन डॉ. मोहन यादव को बनाया है, वो मालवा के उज्जैन दक्षिण विधानसभा सीट से विधायक हैं और ओबीसी चेहरा हैं। जबकि उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा मालवा के ही मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ सीट से विधायक हैं। इसके पीछे संदेश राज्य और राज्य से बाहर भी ओबीसी और आदिवासी समीकरण को साधना है।

यही कारण है कि कांग्रेस में नेतृत्व का जो पीढ़ी परिवर्तन हुआ है, वह मालवा को ध्यान में रखकर ही हुआ है। इसमें जातिगत समीकरण भी साधा गया है।


नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ओबीसी से हैं तो उमंग सिंघार आदिवासी हैं। इस बदलाव के साथ ही कांग्रेस आला कमान ने राज्य में कांग्रेस के दो पुराने दिग्गज चेहरों कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को रिटायरमेंट का साफ संदेश दे दिया है, जबकि भाजपा में यह संदेश थोड़ा अलग ढंग से दिया गया है।

अलबत्ता राज्य में भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल जैसे सीएम पद के प्रबल दावेदार नेताओं को संदेश दिया गया है कि उन्हें मुख्यधारा से अभी बाहर नहीं किया गया है, यही काफी है।
मप्र की राजनीति में यह अभूतपूर्व संयोग है कि अब राज्य का मुख्यमंत्री, एक उप मुख्यमंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष भी मालवा अंचल से ही है।


दोनों पार्टियों में इस पीढ़ीगत बदलाव का युवाओं ने आम तौर पर स्वागत किया है। लेकिन इसी के साथ कुछ गंभीर सवाल भी फिजा में तैर रहे हैं। वो कांग्रेस में इस जवाबी सोशल इंजीनियरिंग और नई पीढ़ी पर दांव लगाने को लेकर हैं।

जहां तक भाजपा का सवाल है तो वह पहले भी दूसरे राज्यों में ऐसा करती रही है और अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे के दम पर इस प्रयोग को (कुछ अपवादों को छोड़ दें तो) सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाती रही है। वहां बगावत की गुंजाइश ज्यादा नहीं होती। कार्यकर्ता आलाकमान के फैसले को सिर आंखों पर रखकर चलता है। इसलिए ऐसे जोखिम ज्यादातर सफल दांव में बदल जाते हैं।

मप्र में नए सीएम डॉ. मोहन यादव आला कमान की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरेंगे, यह अभी देखने की बात है। पर उन्होंने पद संभालते ही टी 20 की तर्ज पर बैटिंग करने का संकेत दे दिया है। जानकारों का मानना है कि भाजपा ने मोहन यादव पर दांव मप्र की ओबीसी राजनीति कम आगामी लोकसभा चुनाव में यूपी और बिहार में यादव वोट बैंक में सेंध लगाने के उद्देश्य से किया है। मोहन यादव यह काम कितना कर पाएंगे, इसी से उनका राजनीतिक भविष्य तय होने की संभावना ज्यादा है। अगर वो नाकाम रहे तो भाजपा के पास रिजर्व में दूसरे अनुभवी खिलाड़ी हैं ही। वैसे मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने पद संभालते ही दो अहम संदेश देने की कोशिश की है, एक तो वो कट्टर हिंदुत्व की राह चलेंगे, दूसरा विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते वो अंधविश्वासी नहीं हैं।

क्या होगी बीजेपी की दिशा और दशा
उम्मीद की जा सकती है कि मोहन राज में अंध श्रद्धा की बजाए तार्किक और प्रगतिशील हिंदुत्व को ज्यादा महत्व मिलेगा। जहां तक मप्र में जातीय समीकरण साधने की बात है तो मोहन यादव का चेहरा इसलिए भी चौंकाने वाला था, क्योंकि राज्य में यादवों की संख्या अन्य दूसरी ओबीसी जातियां जैसे कि लोधी, कुर्मी, गूजर आदि की तुलना में कम है और यादव किसी एक पॉकेट में केन्द्रित होने के बजाए पूरे राज्य में फैले हैं। कुल मिलाकर भाजपा ने मोहन यादव के बहाने पड़ोसी राज्यों का जातीय समीकरण साधने का राजनीतिक योगासन किया है।

जहां तक पीढ़ी परिवर्तन की बात है तो मप्र कांग्रेस में भी वह आलाकमान के निर्देश पर ही हुआ है। माना जा रहा है कि अब पार्टी की कमान परोक्ष रूप से राहुल गांधी पूरी तरह अपने हाथ में ले रहे हैं और राज्य में नए चेहरे उन्हीं की पसंद हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि पार्टी के पुराने दिग्गजों को अब रिटायरमेंट का सिग्नल दे दिया गया है और संगठन में टीम राहुल अब अपने ढंग से आकार लेने लगी है। लेकिन कांग्रेस में अहम सवाल यह है कि अगर इन नए चेहरों को पुराने दिग्गजों का साथ न मिला या भीतरघात की सियासत जारी रही तो ये टीम कैसे परफॉर्म कर पाएगी?

पहले से ही गुटबाजी और अंतर्कलह से जूझ रही कांग्रेस में मनभेदों के खाने ज्यादा कुलबुलाने नहीं लगेंगे? वैसे भी कांग्रेस में इस बदलाव का खास असर लोकसभा चुनाव में दिखने की संभावना बहुत कम है। अलबत्ता इसका प्रभाव अगले विधानसभा चुनाव में जरूर दिख सकता है क्योंकि तब तक कांग्रेस में युवा चेहरों की नई टीम तैयार हो सकने की उम्मीद है।
बहरहाल अब मालवांचल मप्र की राजनीति का नया कुरुक्षेत्र है, जहां से सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनो की रणनीतियों का संचालन होना है। यहां हो रहे राजनीतिक प्रयोगों की गूंज राष्ट्रीय स्तर भी सुनाई देने की संभावना है। मालवा को ये महत्व अर्से बाद मिला है। फर्क यह है कि कभी कांग्रेस का गढ़ रहा मालवा बीते पांच दशकों से भगवा किले में तब्दील हो चुका है।


लेखक मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हें।

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