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सूर्य उदय और अस्त कि लालीमा समान है किन्तु परिणाम भिन्न है – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज

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शुभ भाव, संयम और समभाव को हमेशा ऊपर उठाना चाहिये – आचार्य श्री विद्यासागर महाराज

सुरेन्द्र जैन रायपुर

संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान है।आज के प्रवचन में आचार्य श्री ने बताया कि आप सुबह उठते हैं तो आमोद, प्रमोद के साथ उठते हैं आपका आलस्य दूर हो जाता है। शारीरिक परिस्तिथियाँ जिसकी ठीक नहीं उसको भी आराम सा लगता है।स्वास्छोस्वास (सास लेना एवं छोड़ना) कि प्रक्रिया बहुत ही सुव्यवस्थित चलने लगती है। पूर्व कि ओर गुलाबी आभा उठती है सूर्य नारायण ऊपर आने के पूर्व आसमान में गुलाबी छटा छा जाती है। प्रत्येक व्यक्ति 12 घंटे के लिये सुख, शान्ति, स्वास्थ्य आदि कि अपेक्षा वह अपना योग्य कार्य करना प्रारंभ कर देता है। यह गुलाबी आभा पूर्व कि अपेक्षा से कहा और एक पश्चिम में सूर्य के अस्थाचल के समय लालिमा फूटती है दोनों लालिमा ऊपर से समान दिखती है दोनों में कोई अंतर नज़र नहीं आता है। लाली एक है परिणाम भिन्न है। एक थकावट कि प्रतिक है इसमें सोने कि इच्छा रखता है वह थक गया है।एक लाली सोने के लिये प्रेरित करती है और एक जागने कि प्रेरणा देती है।एक अज्ञान कि गोद में जा रहा है और एक ज्ञान कि गोद से ऊपर उठ रहा है। सूर्य एक है, गुलाबी आभायें एक है लेकिन परिणाम में बहुत अंतर नज़र आता है।यह उदाहरण इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि आप लोग जो चेष्टायें करते हैं उसमे शुभता, संयम भाव, समभाव आदि जुड़े हुए रहते हैं और एक में अशुभ भाव, असंयम भाव, हिंसा कि वृत्ति आदि होती रहती है।चेष्टाये दोनों में होती रहती है किन्तु एक चेष्टा नरक, निगोद आदि कि ओर ले जाती है और एक चेष्टा सीधा मुक्ति तो नहीं मिलती है पर वह स्वर्ग तक लेजा सकती है। स्वर्ग भी अलग – अलग होते हैं और उसमे आयु भी निर्धारित रहती है।वहाँ पर जाकर भी वह जो नियम, संयम आदि लिया था ज्ञान कि आराधना कि थी, मुक्ति और संसार में क्या अंतर है उसे देखा और संसार से दूर हटने के लिये जो हमारे लिये बताया गया है गुरुओं के द्वारा उसका अभ्यास भी करता रहा किन्तु वह सीधा इसलिए नहीं गया क्योंकि उसके पास अभी संयम है किन्तु अभी और संयम का पालन करना शेष है।जब तक वह पूर्ण नहीं होगा वह एक बार स्वर्ग और एक बार मनुष्य भव प्राप्त कर सकता है। इस शुभ और संयम के साथ जो कार्य करता है उसके द्वारा प्रशस्त प्रकृतियों का बंध होता है।यह निश्चित है किन्तु वह बंध कर्म निर्जरा के साथ होता है। वह जो अशुभ प्रकृतियों का बंध किया था उसको विसर्जन करने का कोई साधन है तो ये शुभ संयम और शुभ चेष्टाये आदि है। अशुभ के द्वारा अशुभ का बंध होता है और शुभ के द्वारा अशुभ कि निर्जरा होती है और शुभ का बंध होता है।बंध हमेशा – हमेशा बंध नहीं होता उसका सम्बन्ध देव, शास्त्र और गुरु के साथ होता है। उसके द्वारा संसार का विकास नहीं होता किन्तु संसार से दूर होने का साधन बनता है। आत्मानुशासन में गुणभद्र महाराज जी ने यह लिखा है कि एक लाली जगाती है और एक लाली सुलाती है।इसलिए सुलाने वाली माँ नहीं होती।माँ तो हमेशा जगाती है और विषय, वासनाओं को जगाती नहीं किन्तु सुला देती है। अनंतकाल से आप सोते हुए आये हो एक बार आप जगाने वाली माँ कि आराधना अवश्य करो। आज आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य श्री मनीष कुमार जैन दल्लीराजहरा (छत्तीसगढ़) निवासी परिवार को प्राप्त हुआ। जिसके लिये चंद्रगिरी ट्रस्ट के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन, कार्यकारी अध्यक्ष श्री विनोद बडजात्या, कोषाध्यक्ष श्री सुभाष चन्द जैन,निर्मल जैन (महामंत्री), चंद्रकांत जैन (मंत्री ) ,मनोज जैन (ट्रस्टी), सिंघई निखिल जैन (ट्रस्टी),सिंघई निशांत जैन (ट्रस्टी), प्रतिभास्थली के अध्यक्ष श्री प्रकाश जैन (पप्पू भैया), श्री सप्रेम जैन (संयुक्त मंत्री) ने बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें दी। श्री दिगम्बर जैन चंद्रगिरी अतिशय तीर्थ क्षेत्र के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन ने बताया की क्षेत्र में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी की विशेष कृपा एवं आशीर्वाद से अतिशय तीर्थ क्षेत्र चंद्रगिरी मंदिर निर्माण का कार्य तीव्र गति से चल रहा है और यहाँ प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ में कक्षा चौथी से बारहवीं तक CBSE पाठ्यक्रम में विद्यालय संचालित है और इस वर्ष से कक्षा एक से पांचवी तक डे स्कूल भी संचालित हो चुका है।यहाँ गौशाला का भी संचालन किया जा रहा है जिसका शुद्ध और सात्विक दूध और घी भरपूर मात्रा में उपलब्ध रहता है।यहाँ हथकरघा का संचालन भी वृहद रूप से किया जा रहा है जिससे जरुरत मंद लोगो को रोजगार मिल रहा है और यहाँ बनने वाले वस्त्रों की डिमांड दिन ब दिन बढती जा रही है।यहाँ वस्त्रों को पूर्ण रूप से अहिंसक पद्धति से बनाया जाता है जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से उपयोग कर्त्ता को बहुत लाभ होता है।आचर्य श्री के दर्शन के लिए दूर – दूर से उनके भक्त आ रहे है उनके रुकने, भोजन आदि की व्यवस्था की जा रही है। कृपया आने के पूर्व इसकी जानकारी कार्यालय में देवे जिससे सभी भक्तो के लिए सभी प्रकार की व्यवस्था कराइ जा सके।उक्त जानकारी चंद्रगिरी डोंगरगढ़ के ट्रस्टी सिंघई निशांत जैन (निशु) ने दी है।

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