रिपोर्ट धीरज जॉनसन,दमोह
दमोह जिले के अलग अलग स्थानों में आज भी प्राचीन धरोहर विद्यमान है जिनसे इतिहास की जानकारी प्राप्त की जा सकती है परंतु इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है जिससे इन्हें संजोया जा सके पर इतिहास को गहराई से जानने और खोजने का प्रयास भी नहीं किया गया।

जिले के मोहड़ ग्राम में जो तेंदूखेड़ा तहसील के अंतर्गत है वहां बिखरी हुई विरासत दिखाई देती है जो संरक्षण का इंतजार करते करते विस्मृति के गर्त में समाती जा रही है।यहां अलग अलग करीब पांच स्थानों पर मढ़े के भग्नावशेष बिखरे दिखाई देते हैं। कुछ तो झाड़ियों से ढंक चुके है।

जो मढ़ा अभी भी कुछ सलामत है वहां वर्तमान में अंतराल गर्भ ग्रह मंडप का भाग क्षतिग्रस्त अवस्था में अपने मूल स्थान पर उपलब्ध है।मंदिर के अवशेषों से इसके शिखर के आकार की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। देवालय का मंडप मिश्रित कोटि के चार स्तंभ से युक्त है। मंडप की छत पर पूर्ण विकसित कमल कंद का अंकन अभी भी दिखाई देता है। जानकारों के अनुसार इस देवालय का निर्माण लगभग 9 वीं शताब्दी में किया गया प्रतीत होता है।यहां के पत्थरों की नक्काशी देखने योग्य है।

प्रतिमाओं का अंकन बहुत ही खूबसूरत तरीके से किया गया है व मोहक शिल्पांकन है कुछ प्रतिमाएं अच्छी अवस्था में है खम्बो पर खूबसूरत और तराशी हुई कलाकृतियां मौजूद है
परंतु पहुंच मार्ग की दिक्कत के साथ साथ यहां मढ़े के ऊपर कटिली झाड़ियों, लताओं और जहरीले जीव जंतुओं के अंदेशा के कारण इसे देखना मुश्किल है।हालांकि स्थानीय लोग भी यह चाहते है कि इस का जीर्णोद्धार होना चाहिये जिससे विरासत को विलुप्त होने से बचाया जा सके।

इस संबंध में रानी दमयंती पुरातत्व संग्रहालय दमोह के मार्गदर्शक डॉ सुरेंद्र चौरसिया बताते है कि धरोहरों को संरक्षित करने का प्रयास किया जाना चाहिए,दमोह जिले के दोनी अलोनी और मोहड़ महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में परगणित होते है मोहड़ से प्राप्त भगवान हैग्रीव स्वरूप का अंकन इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण कृतियों में से एक है।