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तुलसी से जुड़े इन नियमों का रखें विशेष ध्यान वरना नाराज होगी देवी लक्ष्मी

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हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी आती है और इस दिन व्रत -उपवास व भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस साल देवशयनी एकादशी 29 जून, गुरुवार के दिन पड़ रही है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन से चार महीने तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में योग निद्रा में रहते हैं।

बता दें कि, चातुर्मास के चार महीनों में कोई मांगलिक व शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं। लेकिन इस समयावधि में जप-तप व आराधना करना बहुत शुभ फलदायी माना जाता है। देवशयनी एकादशी के दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु संग मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और जहां भगवान विष्णु की पूजा होती है वहां तुलसी का अपना अलग महत्व होता है। लेकिन क्या आपको पता है कि देवशयनी एकादशी के दिन तुलसी से जुड़े कुछ नियमों का ध्यान रखना बहुत ही जरूरी हो जाता है नहीं तो पूजा में भूल के कारण आपको नुकसान झेलना पड़ सकता है। तो आइए जानते हैं इस दिन तुलसी से जुड़ी किन बातों का रखना चाहिए ध्यान-

एकादशी के दिन ना दें तुलसी को जल

भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय होती है और इसलिए जब भी जहां भी विष्णु जी की पूजा होती है वहां तुलसी पत्ते रखे जाते हैं, क्योंकि तुलसी लक्ष्मी जी का रुप भी मानी जाती हैं और उसके बिना विष्णु जी को भोग भी नहीं लगता। लेकिन आपको बता दें कि देवशयनी एकादशी के दिन आपने व्रत रखा है तो तुलसी को जल नहीं चढ़ाना चाहिए, क्योंकि मान्यता है कि एकादशी के दिन मां लक्ष्मी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इसलिए एकादशी के दिन गलती से भी तुलसी के पौधे को जल अर्पित नहीं करना चाहिए। वरना मां लक्ष्मी का निर्जला व्रत खंडित हो जाता है।

एकादशी के दिन ना तोड़ें तुलसी पत्ते

हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे की प्रतिदिन पूजा की जाती है और भगवान विष्णु को भी तुलसी के पत्ते के साथ भोग लगया जाता है। लेकिन एकादशी के दिन अगर आप भगवान को भोग लगा रहे हैं तो तुलसी का पत्ता इस दिन ना तोड़ें क्योंकि इस दिन तुलसी तोड़ना अशुभ माना जाता है। लेकिन अगर आपको पूजा के लिए तुलसी के पत्तों को एकादशी के दिन से पहले ही तोड़कर रख लें।

इस रंग के कपड़े पहनकर ना करें पूजा

देवशयनी एकादशी के दिन तुलसी माता की पूजा काले रंगे के कपड़े पहनकर नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से माता लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। इस देवशयनी एकादशी पर भगवान चार महीने के लिए क्षीर सागर में निद्रा के लिए चले जाएंगे।

डिसक्लेमर

‘इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।’

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