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‘राइट क्लिक’-चीते आ गए, खुशी की बात पर घटते जंगल भी बचाएं? -अजय बोकिल

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क्या देश में सर्वाधिक जंगलों वाला मध्यप्रदेश भविष्य में चीता स्टेट कहलाएगा या नहीं इसका जवाब तो आगे चलकर मिलेगा, लेकिन फिलहाल मप्र में नामीबिया से आ रहे चीतों के स्वागत में नगाड़े बज रहे हैं। और बजे भी क्यों न, क्योंकि पहला तो चीते इस देश में खत्म हो चुके थे, यह उनका विदेश से पुनरागमन है, दूसरे चीतों का मप्र के जंगलों में पुनर्प्रवेश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 72 वें जन्म दिन पर हो रहा है और तीसरे जो चीते किंवदंतियों में बचे थे, अब फिर से जिंदा दिखेंगे। इस मुबारक घड़ी में शुभकामना यही है कि चीते भी इस धरती को अपना मानकर बसेरा करें और उनकी आबादी दिन दूनी बढ़े, जैसे कि काफी हद तक मप्र में शेरों की बढ़ी है। लेकिन अहम सवाल यह है कि प्रदेश में सिंहों, शेरों, तेंदुओं और चीतों की आबादी भी बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन राज्य में जंगल घटते जा रहे हैं, उसका क्या? अगर जंगलों की अवैध कटाई और कार्बन उत्सर्जन का यही हाल रहा तो ये जंगली प्राणी जाएंगे कहां, रहेंगे कहां? आलम यह है कि प्रदेश की राजधानी भोपाल के आसपास के जंगलों के शेर अब शहर में आसरा तलाशने लगे हैं, क्योंकि इंसानों ने उनके कुदरती ठिकानों पर अतिक्रमण कर लिया है।

बहरहाल खुशी की बात यह है कि फिर चीते मप्र की धरती पर कदम रख रहे हैं। इस देश में आखिरी चीता शिकारियों के ‘शौक’ के चलते 1947 में ही मार दिया गया था। उसके बाद चीते को लोग सिर्फ उसकी बेमिसाल रफ्‍तार के लिए ही याद करते रहे हैं। चीता 80 से लेकर 128 किमी प्रति घंटे की रफ्‍तार से दौड़ सकता है। हालांकि शिकार वो इस रफ्‍तार से नहीं करता। ‍चीता शब्द संस्कृत के शब्द चित्रय से बना है, जिसका अर्थ होता है चित्रित या विचित्र। चीते के शरीर पर गुलाब के माफिक चकत्ते और कुछ चीतों में काले पट्टे उसे तेंदुए से अलग करते हैं। वह तेंदुए से ऊंचा भी होत है। चीता समूह में रहने वाला प्राणी है। वो शिकार करता है, लेकिन मनुष्य पर आम तौर पर हमला नहीं करता। तो फिर उसे मारने का क्या मकसद हो सकता है? शायद इसकी सुंदर खाल और अहम की तु‍ष्टि।
प्राणी शास्त्र में चीते का नाम ऐसीनोनिक्स जुबेटस है। इसके शरीर की खास बनावट और तेज आंखें इससे सबसे तीव्र गति से दौड़ने वाला प्राणी बनाती है। चीते अब अफ्रीका के कुछ देशों और एशिया में ईरान में ही बचे हैं। इस मायने में नामीबिया से भारत में चीतों के पुनर्वास का यह पहला और महत्वाकांक्षी अंतर्महाद्वीपीय कार्यक्रम है, जिस पर दुनिया की निगाह है। हालांकि इसकी पहल 2009 में तत्कालीन पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश ने की थी। वो अभी राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में व्यस्त हैं। उसके भी काफी पहले ईरान से चीते लाने की कोशिश श्रीमती इंदिरा गांधी के जमाने में हुई थी। लेकिन ईरान में तत्कालीन शाह की गद्दी छिनने से परवान नहीं चढ़ी।
मोदी सरकार और शिवराज सरकार को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होने इस चीता स्थानांतरण प्रोजेक्ट को क्रियान्वित करने में पूरी दिलचस्पी दिखाई। हालांकि ये मेहमान चीते हैं, इसलिए भारत और खासकर कूनो अभयारण्य की जलवायु में कैसे खुद को ढालेंगे, यह देखने की बात है। इस प्रोजेक्ट के संचालको को उम्मीद है कि सब ठीक होगा। क्योंकि इस तरह कुछ अंतर्महाद्वीपीय प्राणि स्थलांतर प्रोजेक्ट सफल रहे हैं। सब कुछ योजना के अनुरूप चला तो पांच साल में चीतों की तादाद पांच सौ को पार कर सकती है। मप्र वन विभाग भी पूरी कोशिश कर रहा है कि यह प्रोजेक्ट कामयाब हो। इसके लिए कूनो वन क्षे‍त्र में बसे गांवों को खाली कराया गया। चीतों की विशेष सुरक्षा व्यवस्था और पूरे अभयारण्य क्षेत्र में 150 चीता मित्र भी नियुक्त किए जा रहे हैं, जो लोगों को बताएंगे कि चीता आपका मित्र है।
वैसे यही सवाल कूनो के उन भेडि़यों, भालुओ, तेंदुओ के मन में भी घुमड़ रहा होगा, जिन्हें जल्द पता चल जाएगा कि जंगल में शिकार का एक और हिस्सेदार वहां आ धमका है। इन सबके बीच दोस्ती और सह अस्तित्व किस तरह बनेगा, इसे पूरी दुनिया देख रही है।

मध्यप्रदेश के लिए सुकून की बात यह है कि कूनो के इस 413 वर्ग किमी में फैले राष्ट्रीय उद्यान में गुजरात के गिर के शेर लाख कोशिशों के बाद भी नहीं आ सके, लेकिन नामीबिया के चीते जरूर आ रहे हैं और उनका स्वागत मोदीजी के हाथों हो रहा है। भाजपा कार्यकर्ताअोंमें उत्साह का आलम यह है कि प्रदेश भाजपा के हैंडल से जारी एक विज्ञापन सो‍शल मीडिया पर दिखा, जिसमें यह कहा गया ‘फिर सुनाई देगी चीतों की दहाड़ ! भारत में चीतों का पुनर्वास। वैसे यह चीतों के लिए भी नई जानकारी थी कि वो ‘दहाड़ते’ हैं। वरना यह दहाड़ अब तक सिंहों और शेरों के लिए ही रिजर्व थी। हकीकत में चीते की आवाज मशीन की घराघराहट और हल्की हुंकार की तरह होती है। दहाड़ता तो केवल शेर ही है। इसीलिए वो जंगल का राजा कहलाता है।
चीतों ने ऐसा दावा कभी नहीं किया। वो अपने काम से काम ज्यादा रखते हैं। लेकिन कुछ आशंकाएं उनके मन भी होंगी। मसलन चीतों के आने की खबर उड़ते ही कूनो के जंगल में अवैध शिकारियों की गति‍विधियां भी बढ़ गई हैं। कारोबारी यह मानकर खुश है कि चीतों के साथ पर्यटन का धंधा भी फलेगा, फूलेगा। लोगो की आवाजाही बढ़ेगी। जंगल के शांत जीवन पर इंसानी मौज मस्ती हावी होगी। इसकी कीमत भी जंगल को ही चुकानी होगी। आश्चर्य नहीं कि लोग चीते देखने के लिए बड़ी तादाद में कूनो आएं। आर्थिक गतिविधियां बढ़ने से स्थानीय लोगों की आय बढ़ सकती है। चीता देखना पर्यटकों का नया क्रेज हो सकता है। वैसे भी चीता दिन में ही निकलता है, शेर की तरह रात को नहीं। कहीं ऐसा न हो कि चीतों की चाह में हमारा पर्यावरण ही भरभराने लगे।
इससे बड़ी चिंता यह है कि मध्यप्रदेश में एक तरफ अभयारण्यों, राष्ट्रीय उदयानों और सुरक्षित वन क्षेत्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ वन क्षेत्र घटता जा रहा है। आज मप्र में 10 राष्ट्रीय उद्यान, 25 अभयारण्य, 19 संरक्षित वन क्षेत्र और 6 टाइगर रिजर्व हैं। अभी भी देश में सर्वाधिक वन क्षेत्र मध्यप्रदेश में ही है। इसका क्षेत्रफल ( इंडिया फारेस्ट सर्वे 2017 के अनुसार) 86 लाख 94 हजार हेक्टेयर है, जो प्रदेश के कुल क्षेत्र फल का 28.27 प्रतिशत होता है। लेकिन मप्र में जारी अवैध कटाई, कार्बन उत्सर्जन और जंगल की आग की वजह से घट रहा है। फैक्ट चेकर की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2021 तक राज्य में 645 वर्ग‍ किमी वन क्षे‍त्र घटा है। हालांकि यह कुल वन क्षे‍त्र एक फीसदी से भी कम है। लेकिन आगे क्या होगा, इसका गंभीर संकेत है। इस पर कोई रोक नहीं लग रही है। वनों के कटने और प्राकृतिक आवासों के मिटने से जंगली प्राणी बेघर होने लगे हैं। हम जंगल का विस्तार नहीं कर सकते तो कम से कम जो हैं, उन्हें तो बचा लें। वरना इतने प्राणियों को रखेंगे कहां? और अब तो चीते भी आ गए हैं।

लेखक ‘सुबह सवेरे’ के वरिष्ठ संपादक हैं।

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