सागर। तिलकगंज में प्रवचन करते हुए मुनि श्री उद्यम सागर महाराज ने कहा कि जीवन में जब भी दान देने का अवसर मिले, उसे गंवाना नहीं चाहिए। दान मनुष्य के लिए एक ‘गोल्डन चांस’ है। सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करने से शुभ कर्मों का संचय होता है और आत्मा के कर्मों की निर्जरा होती है।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति प्रतिदिन भक्तिभाव से जिनेंद्र भगवान का पूजन, अभिषेक और शांतिधारा करता है, उसके जीवन में पुण्य का संचय होता है। भगवान की भक्ति केवल सांसारिक सुखों का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और मोक्ष का मार्ग भी है।
मुनि श्री ने बताया कि सागर में ढाई द्वीप में 170 समवशरणों का आयोजन होने जा रहा है, जिसकी महापूजा भी संपन्न होगी। उन्होंने कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजनों में सहभागी बनना सौभाग्य की बात है। श्रद्धालुओं को इस अवसर का लाभ उठाते हुए अधिक से अधिक धर्म आराधना, पूजन, अभिषेक, शांतिधारा और दान-पुण्य में सहभागी बनकर जीवन को धर्ममय बनाना चाहिए।

मुनि श्री चंद्र सागर महाराज ने कहा कि संसार के कार्यों में आनंद मिलता है, लेकिन मनुष्य को ऐसे कार्य भी करने चाहिए जो आत्मिक आनंद प्रदान करें। मन, वचन और काय से अरिहंतों का ध्यान करना ही आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आज मनुष्य सुबह उठते ही मोबाइल में व्यस्त हो जाता है, लेकिन भगवान और अरिहंतों का स्मरण करने के लिए समय नहीं निकालता। सांसारिक मोह-माया और विकारी भावों के कारण आत्मा पर कर्मों का बंधन होता है। अरिहंतों की प्रतिमाओं के समक्ष श्रद्धापूर्वक माथा टेकने और प्रभु का स्मरण करने से आत्मिक शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। अंतिम समय में भी यदि अरिहंत का स्मरण बना रहे तो जीव की सद्गति होती है। इसलिए निरंतर प्रभु के चरणों में ध्यान लगाते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि मंदिर में प्रदर्शन नहीं, बल्कि दर्शन और आराधना का भाव होना चाहिए। शरीर नश्वर है, समय आने पर यहीं रह जाता है और आत्मा अपनी यात्रा पर निकल जाती है। इसलिए मनुष्य को मिले इस दुर्लभ अवसर का सदुपयोग करते हुए धर्म, आराधना और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।