देवेन्द्र कुमार जैन भोपाल
ब्लूटूथ तो हम सभी इस्तेमाल करते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं इसके अविष्कार के पीछे की दिलचस्प कहानी दरअसल फोन का ब्लूटूथ इतिहास में एक ऐसे राजा से प्रेरित है जिसका सच में एक दांत नीले रंग का बताया जाता था। ब्लूटूथ तकनीक को सबसे पहले स्वीडन में स्थित दूरसंचार कंपनी एरिक्सन ने 1994 के आसपास निर्माण करना शुरू किया था। ताकि बिना तार डिवाइस आपस में जुड़ सकें। इस टेक्नोलॉजी का उद्देश्य था।मोबाइल, कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को बिना वायर के आपस में कनेक्ट कर डेटा को भेजना आसान बनाना। लेकिन जब टेक्नोलॉजी बन गई तो सबसे बड़ी समस्या थी इसका एक अच्छा और यूनिक नाम क्या रखा जाए। तभी इंटेल के इंजीनियर जिम कार्डच को एक इतिहास की किताब पढ़ते समय एक विचार आया। उन्होंने पढ़ा 10वीं सदी के एक राजा हराल्ड गोरमिसन् के बारे में पढ़ा जिसे लोग हराल्ड ब्लुटूथ कहते थे। कहा जाता है उस राजा का एक दांत काला या नीला दिखाई देता था इसी वजह से उसका नाम पड़ा ब्लूटूथ लेकिन असली कारण सिर्फ दांत नहीं था बल्कि वह राजा अलग-अलग कबीलों को एक साथ जोड़ने के लिए मशहूर था। उसने डेनमार्क और नॉर्वे के कई हिस्सों को एकजुट किया था।और लोगों को साथ लाया था। इसी बात से इंजीनियर को विचार आया कि यह टेक्नोलॉजी भी अलग-अलग डिवाइस को आपस में जोड़ने का काम करती है। इसलिए इस वायरलेस कनेक्शन टेक्नोलॉजी का नाम ब्लूटूथ रखा गया ताकि यह दिखे कि यह सबको जोड़ने वाली टेक्नोलॉजी है। इतना ही नहीं ब्लूटूथ का जो लोगो है वो भी उसी राजा से प्रेरित माना जाता है। असल में लोगो दो पुराने अक्षरों की बनावट से बना है जो उस राजा के नाम के अक्षर माने जाते हैं। ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी का पहला संस्करण 1998 में जारी किया गया था, और तब से यह वायरलेस म्युनिकेशन के लिए एक लोकप्रिय तकनीक बन गई है। आज, ब्लूटूथ का उपयोग विभिन्न डिवाइसों में किया जाता है, जैसे कि हेडफ़ोन, स्पीकर, स्मार्टफ़ोन, और कंप्यूटर।आज ब्लूटूथ दुनिया की सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली वायरलेस टेक्नोलॉजी बन चुका है और हर फोन में मिलता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका नाम किसी मशीन से नहीं बल्कि एक राजा से आया है।