सागर । हम किसी पर धन का बोझ लाद नहीं सकते हैं लेकिन छोटी- छोटी राशि समूह के रूप में देकर उसे विशाल राशि बना सकते हैं यह कार्य मैत्री समूह अच्छे से कर सकता है समाज के बच्चों को गोद ले पढ़ाई कराये इस प्रकार की रचनात्मक कार्य समाज में मैत्री समूह कर सकता है यह बात समाधिस्थ मुनि श्री क्षमा सागर महाराज के 11 वे समाधि दिवस पर 25 एकड़ (भाग्योदय) में बनी उनकी समाधि पर हुए कार्यक्रम में मुनि श्री महासागर महाराज ने कही।
उन्होंने कहा कि सभी को संकल्पित होना है कि जो हम द्रव्य, अर्थ हम उपार्जन करते हैं उस अर्थ का प्रयोग हमे समाज की प्रतिभाओं के लिए करना है थोड़ा सा अंश निकालो ज्यादा नहीं चाहिए मैत्री समूह में एक ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए।
मुनि श्री महासागर महाराज ने कहा कि समाधिस्थ मुनि श्री क्षमा सागर महाराज का वैराग्य इतना दृढ़ था। अस्वस्थ में वह कहते थे हम तुमसे डरने वाले नहीं तुम मेरी इस आवाज को बंद कर आओगे मैं जो पहले बोल चुका हूं मैं पूरे ब्रह्मांड में समाया हुआ है उसको तुम रोक नहीं पाओगे उनका जो विचार था उनका जो कवि हृदय था वही बताता है क्योंकि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को अगर हम देखते हैं तो उसे व्यक्ति के विचारों से उनके साहित्य से ही उसकी छवि का हमें अनुमान लग जाता है कि उनका व्यक्तित्व कैसा था क्योंकि जो व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता है उसे व्यक्तित्व के निर्माण में वह अपने विचारों को गूधंता है अपने विचारों को सजाता है और उन विचारों को सृजन के लिए उन विचारों में उसे खोना पड़ता है उन विचारों में कोई बिना कभी भी कोई कभी अपने उसे भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकता है और उन विचारों में खोना ही उसकी साधना का मूल कहा गया।
उन्होंने कहा कि जिसके पास जो होगा वही तो वह देगा और क्या देगा हम आपको क्या दे सकते हैं बताओ जो हमारे पास में होगा वही तो हम देंगे संसार का नियम ही है उस व्यक्ति की विचारधारा को देखिए वह क्या दे रहा है उसके मन में भाव कैसे हैं गुरुदेव के मन में हमेशा जगत कल्याण के भाव रहते थे इसलिए तो हम जैसे लोग गुरुदेव के पास ऐसे ही खिंचे चले आते थे। मुनि श्री क्षमा सागर महाराज में आत्म कल्याण की भावना थी वह जानते थे यह संसार तो दुखों से भरा हुआ है यह शरीर तो रोगो का घर है कहां तक इस मोह के पीछे चलकर के हम अपनी आत्मा को पतित करते रहेंगे।
मुनि श्री ने कहा कि आत्मा स्वयं अपने आप प्रभावित होकर के खिंची चली जाती आत्माओं का औरा ऐसा होता है उस औरा से चुंबकीय जो किरणें निकलती है उसे दूसरी भव्य आत्माएं अपने आप खिची चली आती है गुरुदेव जो भव्य आत्मा के रूप में थे आत्मा से हम जैसे लोग अपने आप खिंचे चले आये। संसार कैसा था इनका इतिहास तो सभी का काला ही रहेगा उस इतिहास को ब्राइट करने के लिए ही इन आत्माओं का समागम हम लोगों को मिला करता है।
आत्मा का अंतिम लक्ष्य यही है और कुछ नहीं है चाहे श्रमण हो चाहे श्रावक हो दोनों मोक्ष मार्गी कहे जाते हैं और मोक्ष मार्ग का अंतिम लक्ष्य अंतिम समाधि मरण कहा गया और कुछ नहीं है हमारा प्रयोजन हम लोग जीवन में साधना करते हैं वह साधना जीने की साधना नहीं होती है मरने की साधना होती है।
सुबह 7 बजे समाधि पर एकत्रित होकर आचार्य श्री की पूजन और अर्घ चढ़ाकर कार्यक्रम की शुरुआत हुई कुछ लोगों ने मुनि श्री क्षमा सागर महाराज के संस्मरण सुना करके लोगों को भावुक कर दिया कार्यक्रम में विशेष रूप से पीसी नायक, मुकेश जैन ढाना, टोनी केसली, सुरेश जैन विदिशा, आलोक जैन मुंबई, सहित दिल्ली, मुंबई, भोपाल,कोटा, दुबई, बिलासपुर, झांसी, नोएडा, छतरपुर,बीना, कटनी,दमोह,विदिशा, सागर आदि स्थानों के लोग इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन ब्रह्मचारी विजय भैया लखनादौन ने किया।
दोपहर में 2 बजे से समाधि दिवस के अवसर पर विधान का आयोजन किया गया शाम को गौराबाई मंदिर के प्रांगण में बाहर से आये कलाकारों ने अपने भजनों से दर्शकों का मन मोह लिया।
न्यूज सोर्स- मुकेश जैन ढाना सागर