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खामेनेई की मौत पर भारत में खिंची सियासी रेडलाइन के मायने-अजय बोकिल

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आलेख

अजय बोकिल 

ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता और दुनिया भर में शिया मुसलमानों के रहनुमा अयातुल्लाह अली खामेनेई के अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए खात्मे पर भारत में सियासत की नई रेड लाइन खिंच गई है। देश में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां ‘खामेनेई की हत्या’ पर ‘मोदी सरकार की चुप्पी’ को भारतीय विदेश नीति पर प्रश्न चिन्ह बता रही हैं। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता श्रीमती सोनिया गांधी ने एक अंग्रेजी अखबार में लिखे लेख में खामेनेई मामले में मोदी सरकार के रवैये को ‘चिंताजनक चुप्पी‘ करार देते हुए संसद में इस पर तुरंत चर्चा की मांग की। उन्होंने खामेनेई की ‘लक्षित हत्या’ पर भारत सरकार के मौन को “जिम्मेदारी से पीछे हटना” करार देते हुए कहा कि अब हमे अपनी नैतिक शक्ति के ‘पुनर्अन्वेषण’ और उसे स्पष्टता और प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त करने की तत्काल आवश्यकता है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि इस स्थिति में हमारी चुप्पी तटस्थता नहीं है। विपक्षी दलों की अोर से यह भी आरोप लगाया गया कि भारत की विदेश नीति ‘संतुलित’ न होकर किसी एक पक्ष में झुकी ज्यादा प्रतीत होती है। इसके जवाब में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पोस्ट‍ किया कि भारत में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या पर भी 1984 में खामेनेई ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी, ऐसे में भारत की कौन सी विवशता है। हालांकि भारत सरकार ने गुरूवार को खामेनेई के निधन पर अपनी आधिकारिक संवेदना व्यक्त कर दी है, लेकिन पीएम मोदी अभी भी विपक्ष के निशाने पर हैं। भारत सरकार ने इस पूरे मामले में कोई अधिकृत बयान जारी न कर, केवल विश्वशांति कायम रखने और संवाद से विवाद सुलझाने की वकालत की है। हमने न तो इजराइल- अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले का समर्थन किया और न ही खामेनेई के मारे जाने की निंदा की। अलबत्ता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमले के दो दिन बाद मध्‍य पूर्व के खाड़ी देशों के कुछ राष्ट्राध्यक्षों से बात की और वहां रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। चूंकि इस संघर्ष के सभी पक्ष हमारे दोस्त हैं, इसलिए हम सभी के साथ हैं या किसी के भी साथ नहीं है। इसका एक अर्थ यह भी निकाला गया कि विश्व की बड़ी आर्थिक और सैनिक ताकत होते हुए भी भारत की वैश्विक मंच पर कोई खास आवाज नहीं है।
मोदी सरकार पर आरोप है कि उसने एक ऐसे देश, जिसके साथ भारत के सदियों से ‍िमत्रतापूर्ण रिश्ते रहे हैं, के सर्वोच्च धार्मिक नेता की मौत पर राजकीय शोक घोषित करना तो दूर, सामान्य दुख तक नहीं जताया। परोक्ष रूप से यह भारत में रह रहे मुसलमानों और खासकर शिया मुसलमानों की भावनाअों की अनदेखी है। जबकि भारत का सरकार का रवैया इस बात का संकेत है कि तीन देशों की आपसी लड़ाई में हमारी चिंताएं केवल हमारे अपने हित हैं आतंकवाद पर ‘जीरो टालरेंस’ के चलते हम ऐसे किसी भी पक्ष के साथ खड़े नहीं दिखना चाहते, जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से आंतकवाद का हिमायती हो।
श्रीमती सोनिया गांधी ने जो कहा, जरा उसे तथ्यों, तर्कों, रणनीतिक और व्यावहारिक पैमाने पर परखें। ईरान में 1979 में जब तत्कालीन अमेरिका समर्थित राजा शाह पहलवी को हटाकर इस्लामिक क्रांति हुई, तब भारत में जनता पार्टी की सरकार थी। उस सरकार ने भी कट्टर इस्लामिक क्रांति का खुलेमन से स्वागत नहीं किया था। जो प्रतिक्रिया थी, वह भारत और ईरान के ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्तों के आधार पर थी। लेकिन उसी इस्लामिक क्रांति के शिल्पकार अयातुल्लाह रोहिला खामेनेई का जब 3 जून 1989 को निधन हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भारत में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया था। ऐसा ही शोक तब पाकिस्तान ने भी घोषित किया था। लेकिन इस बार पाकिस्तान ने कोई राजकीय शोक घोषित नहीं किया। उलटे ईरान के मामले में वह विरोधी खेमे में खड़ा दिखाई दिया। हो सकता है कि सोनिया गांधी लेख के बहाने राजीव गांधी की मुस्लिम हितैषी नीतियों की याद दिला रही हों। याद करें, यही वो समय था, जब देश में शाह बानो और राम मंदिर की राजनीति सिर उठा रही थी। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की चक्की चलने लगी थी। तुष्टीकरण के भंवर में फंसी कांग्रेस का मुस्लिम वोट बैंक खिसकने लगा था, जो अभी भी आंशिक रूप में ही लौटा है। अब कांग्रेस की कोशिश शायद इसी वोट को और मजबूत करने की हो। क्योंकि जल्द ही केरल और असम जैसे राज्यों में विस चुनाव हैं, जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। एक बात और याद रखें। अयातुल्लाह खामेनेई केवल शिया मुसलमानों के नेता थे। उनमें भी मुख्‍यत: बारह इमामो ( अरबी में इत्ना आशारिया) को मानने वाले शियाअों के सर्वोच्च नेता थे। लिहाजा उनका दुखी और आक्रोशित होना स्वाभाविक है। ये बारह इमाम अरब में ई.स. 599 से लेकर 869 तक हुए ( सुन्नी मुसलमान इसमें विश्वास नहीं करते)। बारह शब्द इस विश्वास पर आधारित है कि पैगंबर मुहम्मद के परिवार से बारह पुरुष वंशज ( अली इब्न अबी तालिब से लेकर मुहम्मद अल-मेहदी तक) वो इमाम हैं, जिन्होंने इस्लाम में दैवी प्रेरणा से शरिया की धार्मिक और न्यायसंगत व्याख्या की। इनमे से आखिरी इमाम अल मेहदी को शिया अमर मानते हैं, जबकि बाकी 11 में से दो की हत्या और नौ को जहर देकर मार दिया गया। मारने वाले भी उनके करीबी ही थे। वैसे इस्लाम के शिया सम्प्रदाय में भी कई उपसम्प्रदाय हैं। मसलन जैदी शियाअोंऔर रहस्यवादी अलेवी‍ शियाअों का कोई एक धार्मिक नेता नहीं है। जैदी पांच और अलेवी दो इमामों को ही मानते हैं। शियाअोंका एक और उपसम्प्रदाय कासेनिया शियाअोंका है, जो चार इमामों को मानते हैं। जबकि शिया दाउदी बोहरा 21 इमामों को मानते हैं और उनके सर्वोच्च धार्मिक नेता सैयदना साहब और इस्माइली आगाखानी शियाअोंके सर्वोच्च नेता प्रिंस आगाखान हैं।
भारत में करीब 25 करोड़ मुसलमानों में से करीब 20 फीसदी शिया हैं और कुल शियाअोंमें 80 फीसदी बारह इमामत को मानने वाले हैं। भारत में 80 फीसदी मुस्लिम वोटर सुन्नी हैं। अगर सोनिया गांधी इसी वर्ग को एड्रेस कर रही हैं तो कांग्रेस को वोट की दृष्टि से कितना फायदा होगा, समझा सकता है। जबकि ईरान के मसले में विश्व में शिया सुन्नी-विभाजन एक बार फिर से और गहरा गया है। जहां तक राजकीय शोक घोषित करने की बात है तो दुनिया में ईरान के अलावा केवल शिया बहुल इराक ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया। एक और शिया बहुल देश अजरबैजान ने केवल शोक जताया। बाकी सुन्नी देश खामोश ही हैं। भारत में भी जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वो मुख्‍य रूप से बारह इमामतपंथी शिया मुसलमान ही कर रहे हैं। इसमें भी कश्मीर घाटी में हो रहे प्रदर्शन के पीछे वहां की स्थानीय राजनीति ज्यादा है।
अमूमन कोई भी देश किसी महान व्यक्तित्व के निधन पर शोक तभी जताता है, यदि वह राष्ट्राध्यक्ष हो अथवा उसका कोई सकारात्मक वैश्विक योगदान हो। दिवंगत अयातुल्लाह ईरान में इस्लामिक क्रांति करने वाले अयातुल्लाह रोहिला के उत्तराधिकारी थे न कि उस क्रांति के शिल्पकार। महिलाअों के बारे में उनकी सोच तो जगजाहिर है ही। अलबत्ता खामेनेई को इस बात का श्रेय जरूर दिया जा सकता है कि उन्होंने ईरान में इस्लामिक सत्ता को स्टील फ्रेम में बदलने के लिए पूरी ताकत लगा दी और इसके खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलने में रत्तीभर संकोच नहीं किया। ईरान की पहचान को उदार इस्लाम की जगह कट्टर इस्लाम से जोड़ा और विश्व में अपने दुश्मनों को कमजोर करने के लिए तीन बड़े आतंकी संगठन खड़े किए, उन्हें पाला पोसा। साथ ही उन्होंने महाबली अमेरिका की दादागिरी को निर्भीकता से चुनौती दी और ईरान को परमाणु शक्ति बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।
जहां तक भारत के साथ ईरान के रिश्तों की बात है तो यह मोटे तौर पर ठीक ही रहे हैं। यूं तो ईरानियों को आर्यों की अलग हुई शाखा के रूप में भी माना जाता है। उनकी फारसी भाषा हमारी संस्कृत जितनी ही पुरानी और समृद्ध है। लेकिन यह वही ईरान है, जहां इस्लाम के आगमन के बाद वहां के लोगों ने अपने ही पुरूखों का पारसी धर्म मानने वालों को देश छोड़ने पर विवश किया। ईरान में अपनों के प्रति असहिष्णुता की कहानी तभी से शुरू होती है, जो आज तक जारी है। ईरान और भारत के बीच लोग आते-जाते रहे हैं। व्यापार भी होता रहा है। मुगलों के जमाने में बादशाह हुमायूं ईरान से लौटकर कई ईरानी विद्वानों को साथ लेता आया। उसका नतीजा यह हुआ कि मुगल दरबार की राजभाषा फारसी बनी, जिसका कुछ असर अभी तक है।
ईरानियों ने भारत को जो दिया, वैसे ही लूटा भी। नादिरशाह दुर्रानी 1739 में ईरान से ही आया था, और वो अपने साथ कोहिनूर, दरिया-ए-नूर जैसे बेशकीमती हीरे और मुगल बादशाह के सोने से बने अप्रतिम तख्ते ताऊस के साथ साथ अकूत सोना-चांदी लूट कर ले गया। यही नहीं, उसने दिल्ली में कत्लेआम किया, जिसमें मरने वाले बड़ी तादाद में मुसलमान ही थे। कोहिनूर तो अंग्रेज ले गए, लेकिन बेशकीमती दरिया-ए-नूर हीरा आज तक ईरान ने हमे नहीं लौटाया। वह ईरानी सेंट्रल बैंक में रखा है। और तख्ते ताऊस को तोड़-ताड़ कर उसका सोना और जवाहरात ईरानी राजा ने अपने सिंहासन में जड़वा लिए। नादिरशाह के बाद उसके उत्तराधिकारी अहमदशाह अब्दाली ने भारत को चार बार लूटा और देश में उभरती मराठों की ताकत को पंगु बनाकर चला गया।
अगर खामेनेई के निधन पर शोक का नैतिक आधार ढूंढे तो भारत आजाद होने के बाद ईरान के तत्कालीन शाह के साथ हमारे रिश्ते ठीक ही थे, लेकिन उसका झुकाव मुस्लिम होने के कारण पाकिस्तान की तरफ ज्यादा रहा। इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति शिया-सुन्नी तराजू पर ज्यादा निर्धारित होने लगी। वहां के शासकों ने भारत के मामले में संतुलन बरतने की कोशिश की। अयातु्ल्लाह अली खामेनेई ने कश्मीर मुद्दे पर केवल एक बार भारत का खुलकर साथ 1991 में दिया था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव की पहल पर उसने संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्लामिक देशों के संगठन द्वारा कश्मीर पर भारत के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का विरोध कर उसे रूकवा दिया था। तो क्या कांग्रेस उसी का अहसान का बदला चुकाना चाह रही है? इस एक उदाहरण को छोड़ दिया जाए तो भारत के मुसलमानों और कश्मीर को लेकर ईरान का रवैया भारत के अनुकूल नहीं रहा है। जबकि हमने ईरान की कई तरह से मदद की और करते आ रहे हैं। कश्मीर से धारा 370 हटाने पर ईरान ने भारत की खुलकर आलोचना की तो भारत ने उसका कड़ा विरोध ‘हमारे आंतरिक मामले में दखल’ के रूप में किया था। अयातुल्लाह कई बार भारत के मुसलमानों की स्थिति को लेकर सवाल उठाते रहे, लेकिन भारत ने इसे आपसी रिश्तों में कटुता तक नहीं पहुंचने दिया। अयातुल्लाह खामेनेई 1990 में एक बार भारत यात्रा पर आए थे और वो कर्नाटक और श्रीनगर गए थे। उन्होंने श्रीनगर में मुसलमानों की सभा को सम्बोधित किया था। कहते हैं ‍िक उनके भाषण के बाद वहां शिया और सुन्नियों में भाईचारा बढ़ गया था। इसी पर वहां अब आंतरिक राजनीति हो रही है।
अब सवाल ये कि भारत को और उसके प्रधानमंत्री को खामेनेई की मौत पर अपनी प्रतिक्रिया क्या और कैसी देनी चाहिए थी? या फिर चुप रहना ही बेहतर था? अगर ईरान को भारत हितैषी के रूप में देखें तो इतिहास इसकी बहुत पुष्टि नहीं करता और हर धार्मिक नेता के निधन पर देश को प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं है। वैसे भी कूटनीति में नैतिकता की परिभाषा व्यापक रा‍ष्ट्रीय हितों से तय होती है। फिर भी मोदी मानवीय आधार पर शोक जता सकते थे। लेकिन लगता है, उन्होंने किसी ‘भावुक नैतिकता’ और ‘वोट बैंक को एड्रेस’ करने की जगह व्यावहारिकता को तरजीह दी। इसके पीछे कारण अमेरिकी दबाव के साथ साथ इजराइल से हमारी बढ़ती नजदीकी और बदलता वर्ल्ड आॅर्डर है। आज ईरान के साथ भारत तो क्या दुनिया का कोई भी देश खुलकर नहीं खड़ा है। रूस और चीन भी केवल बयानों की बाटियां सेंक रहे हैं, ऐसे में भारत ईरान के साथ हमदर्दी जताकर भी क्या हासिल कर लेता। कर भी लेता तो इस बात की क्या गारंटी है कि ईरान में यही सत्ता कायम नहीं रहेगी और भविष्य में भारत किसी संकट में फंसेगा तो क्या ईरान उसका आंख मूंदकर समर्थन करेगा? बेशक परमाणु बम बनाने के नाम पर अमेरिका और इजराइल ने ईरान के साथ जो किया है, वो भी वैश्विक आतंकवाद ही है, लेकिन आतंकी संगठनों को पोस कर ईरान भी प्रकारांतर से वही कर रहा है। ऐसे में ‘वेट एंड वाॅच’ ही ज्यादा भली है या अति उत्साह में कोई प्रतिक्रिया देना?

– लेखक सुबह सवेरे के कार्यकारी प्रधान संपादक हैं।
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