आलेख
हरीश मिश्र
ऋतुएं केवल मौसम नहीं होती, वे जीवन की मुस्कान हैं… प्रकृति का मनोभाव है। कभी खुशी की, कभी गम की, कभी परिवर्तन की।
सनातन पंचांग के अनुसार 23 अक्टूबर की सुबह 9 बजकर 20 मिनट पर हेमंत ऋतु का आगमन हुआ। यह वही ऋतु है जब सूर्य का तेज़ थोड़ा थम जाता है और चंद्रमा की शीतलता अपने प्रभाव का विस्तार करती है। शरीर में कफ का संचय बढ़ता है।
संयोग देखिए… उसी दिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भी संगठन में शीतलता और स्थिरता का नया अध्याय लिखा।
गोधूलि बेला में दीपोत्सव और गोवर्धन पूजन के उपरांत उन्होंने “जगत” का “प्रसाद” ग्रहण किया, “मोहन” को पुष्पगुच्छ अर्पित किया, “हितानंद” से कल्याण का आशीर्वचन पाया, और “महाराज के प्रभु” की कुटी में ज्योति प्रज्ज्वलित कर संगठन की लौ को और उज्ज्वल किया।
“क्षितिज” में आतिशबाज़ी की, “शिव” के गणों को दायित्व सौंपे, और संघ दक्ष के बाद “संगीत” की लय पर “जय” घोष के साथ विजय की ताल ठोकी।
राजनीति के इस दीपोत्सव में हेमंत जी का चंद्रमा तो निस्संदेह प्रभावशाली रहा, किंतु जातीय और क्षेत्रीय संतुलन की ठंडी हवा में केंद्र से प्रदेश में आए कुछ वरिष्ठ राजनेताओं की नाक बहती नज़र आई।
कहना उचित होगा… मौसम बदल गया है, किंतु राजनीति का कफ अब भी स्थायी रोग बना हुआ है। इसका उपचार संभवतः राजनीति के बाहर ही है।
फिर भी, हेमंत परिवार में सामूहिक दृष्टिकोण, सहयोग, समन्वय और संगठन का उत्कृष्ट संयोजन झलकता है। उन्होंने जातीय और भौगोलिक तालमेल को केवल दिखावा नहीं बनाया, अपितु उसे एक जीवंत यथार्थ का रूप दिया है। समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय नेतृत्व को यथोचित स्थान देकर उन्होंने संकेत दिया है कि संगठन में नर्मदा की धारा ‘मनमर्जी’ से नहीं, बल्कि सामंजस्य से बहती है।
सामूहिकता का अपना अद्भुत महत्त्व है… जहां समन्वय और सहयोग का संगीत गूँजता है, वहाँ सबसे कठिन कार्य भी सहज हो जाते हैं।
हेमंत खंडेलवाल ने 2028 को लक्ष्य बनाकर जो संगठनात्मक परिवार-विस्तार प्रारंभ किया है, वह यदि इसी लय में चलता रहा, तो राजनीति की यह हेमंत ऋतु आने वाले वर्षों में भी शीतल और शुभ बनी रहेगी।
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हे।