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प्रबंधक और वृद्धाश्रम आगंतुक के प्रयास रंग लाए: 15 महीने बाद बुजुर्ग की घर वापसी

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धीरज जॉनसन दमोह

इंसानियत और सेवा की तस्वीर तब सामने आई, जब दमोह वृद्धाश्रम प्रबंधन और एक रेलवे कर्मचारी की पत्नी के प्रयासों से मई 2024 में यहां पहुँची भटकी हुई बुजुर्ग महिला आखिरकार अपने परिवार के पास सकुशल लौट सकीं। यह संवेदनशील घटना न केवल सहयोग की मिसाल बनी बल्कि यह भी साबित कर गई कि संवेदना और संकल्प से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

मई 2024 के पहले सप्ताह में शहर से सागर मार्ग पर मढिया पनगरहा, कौरासा के पास स्थित मंदिर में एक अज्ञात बुजुर्ग महिला देखी गईं। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन को सूचना दी कि महिला की बोली समझ नहीं आ रही है और यदि उन्हें वृद्धाश्रम भेजा जाए तो बेहतर देखभाल संभव होगी।

(मई 2024 की फाइल तस्वीर)

वृद्धाश्रम प्रबंधक अपनी टीम के साथ पहुँचे और महिला को अपने संरक्षण में लिया पर उनकी पहचान करना कठिन था। न कोई पहचान पत्र, न स्पष्ट भाषा। महिला अक्सर “बींद” शब्द का उच्चारण करतीं, जो किसी को समझ नहीं आ रहा था।

इसी बीच आश्रम में प्रत्येक माह आगंतुक के रूप में पहुंचने वाली एक रेलवे कर्मचारी की पत्नी, श्रीमती आर. सिंह जो बिहार के नालंदा क्षेत्र की रहने वाली थीं। उन्होंने महिला की बोली को ध्यान से सुना और पहचान लिया कि यह बोली बिहार की मगही बोली/ भाषा है। “बींद” वास्तव में नालंदा जिले के पास का इलाका निकला।

इसके बाद वृद्धाश्रम प्रबंधन और श्रीमती सिंह ने मिलकर खोजबीन शुरू की। तस्वीरें मीडिया के माध्यम से साझा की गईं, क्षेत्र के लोगों से संपर्क किया गया। धीरे-धीरे धुंध साफ हुई,महिला का नाम झालो देवी निकला। बींद क्षेत्र में रहने वाले उनके भाई देवशंकर और भतीजों ने फोटो देखकर तुरंत पहचान की।

झालो देवी के बेटे विजयानंद, तीनों पुत्रों व अन्य परिजनों से वीडियो कॉल पर बातचीत कराई गई। महिला ने बेटे और पोते का नाम लेकर पहचान की पुष्टि की। आवश्यक पहचान पत्रों के सत्यापन के बाद परिजन दमोह पहुँचे और भावुक माहौल में मां को अपने साथ लेकर गए।

परिवार ने बताया कि झालो देवी को भूलने की बीमारी है। वे पहले भी कई बार घर से भटक चुकी हैं, यहाँ तक कि दिल्ली में भी एक बार गुम हो गई थीं, लेकिन खोजबीन के बाद वापस मिली थीं।

श्रीमती आर. सिंह ने बताया “मैं हर महीने वृद्धाश्रम जाती हूँ और प्रयास रहता है कि बुजुर्गों के साथ समय व्यतीत कर सकूं,ताकि उन्हें थोड़ा सुकून मिले। जब मुझे पता चला कि एक महिला की भाषा समझ में नहीं आ रही, तो मैंने बात करने की कोशिश की। संयोग से उनकी मगही बोली थी। बाद में, जब नालंदा गई तो महिला द्वारा बताए गए स्थानों की पुष्टि की। इसी कड़ी में परिचितों से जानकारी मिली और आखिरकार यह संभव हो पाया कि वे अपने घर लौट सकीं।”

झालो देवी की घर वापसी का पल बेहद भावुक था। वृद्धाश्रम प्रबंधन, रेलवे कर्मचारी की पत्नी और परिजनों काफी खुश थे। यह घटना समाज को यह संदेश देती है कि यदि संवेदना, धैर्य और सहयोग हो तो हर भटकी हुई राह किसी न किसी दिन घर तक पहुँचा ही देती है।

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