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जंगल में दिखाई देने लगे औषधीय तत्वों से भरपूर फल:दवाई के रूप में होता है इस्तेमाल

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रिपोर्ट धीरज जॉनसन,दमोह

दमोह जिले के जंगल क्षेत्र में इन दिनों इंसान और मवेशियों के लिए औषधीय और पौष्टिक तत्वों से भरपूर फल दिखाई देने लगे है।


तेंदू का पेड़ जिसके पत्ते से बीड़ी बनाई जाती है अब उसमें फल दिखाई देने लगे है जो चीकू फल के समान प्रतीत होते है जो हल्के लाल,नारंगी और पीले रंग के होते है,अंडाकार ये फल मार्च से जून के मध्य फलते है पोषक तत्वों से भरपूर ये फल ग्रामीणों के लिए अन्य फलों की पूर्ति करता है जो जंगल क्षेत्र तक नहीं पहुंच पाते है।


तो वहीं जंगल में छोटे छोटे और छड़ी के समान फल पेड़ों में लटकते हुए दिखाई देने लगे है इसे यहां किरवारा कहा जाता है इसका इस्तेमाल पशु औषधि के रूप में किया जाता है। काढ़ा, धोनीदेना, अजवाइन, लहुसन,गुड, हल्दी, कचरियां बनाकर पालतू पशुओं को दिया जाता है जिससे वे बीमारी से बच सकें। अगर पशुओं में बीमारी जैसे लक्षण दिखाई देते है तो ग्रामीण इस फल का उपयोग दवाई के रूप में करते है।ग्राम सरसेला से नोनेलाल परस्ते बताते है कि अगर मवेशी बीमार लगता है तो किरवारा/कैरवारा के फल, नीम, अजवाइन को उपले में जला कर उसका धुंआ करते है जो मवेशियों के लिए लाभदायक होता है। हमारे क्षेत्र के अधिकतर ग्रामीण मवेशियों के लिए दवाई के रूप में इसका उपयोग करते है, कभी कभी किरवारा के बीज का इस्तेमाल कर छोटे बच्चों को लू लगने से भी बचाया जाता है।और तेंदू के फल को जंगल से इकट्ठा करके घर लाते है जिसका स्वाद थोड़ा खट्टा और मीठा होता है।


स्थानीय पीजी कॉलेज में सहायक प्राध्यापक रिक्त पद के विरुद्ध आमंत्रित अतिथि विद्वान डॉ ए आर यादव (जूलोजी) ने बताया कि इसे सुनहरा वृक्ष और वनस्पतिक नाम कैसिया फिस्टुला है,इसका उपयोग औषधि के रूप में बहुतायत से होता है , हेपेटोप्रोटेक्टिव, सूजन-रोधी, एंटीट्यूसिव, एंटीफंगल होने के साथ साथ घावों को भरने, पेट की समस्याओं एवं अपच और जीवाणुरोधी इत्यादि समस्याओं में किया जाता है, ग्रामीणों द्वारा इसका उपयोग इंसानों और पालतू जानवरों के उपचार के लिए किया जाता है, बुंदेलखंड के जंगलों में यह पौधा बहुतायत में पाया जाता है,
इसके पीले फूल किसी गजरे से कम नहीं लगते जो जंगल की शोभा को कई गुना बड़ा देते हैं,फूलों के समय जंगल की रौनक में चार चांद लगाने का काम करते है।

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