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परदे की भाषा और फ़िल्म निर्माण -राजेश बादल

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हाल ही में जम्मू जाना हुआ।सेंट्रल यूनिवर्सिटी ने राष्ट्रीय स्तर पर पांच दिन की कार्य शाला आयोजित की थी। यह विज्ञान लेखन, फ़िल्म निर्माण और परदे की भाषा पर केंद्रित थी । विश्वविद्यालय का पत्रकारिता विभाग इसका सूत्रधार था । इसमें पत्रकारिता के छात्रों ,शिक्षकों के अलावा बड़ी संख्या में जम्मू कश्मीर के फौजियों तथा अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के शिक्षक भी शामिल हुए ।विज्ञान प्रसार और भारतीय सेना ने इस अनुष्ठान में अपनी आहुति दी ।


चार दिन तक फ़िल्म निर्माण की बारीकियों को अपने अनुभवों और अपनी फ़िल्मों के माध्यम से प्रतिभागियों को संप्रेषित करने का अनुभव दिलचस्प रहा । उनके सवालों ने सारे सत्रों को जीवंत बना दिया । पहले दिन इसमें राज्य सभा के उप सभापति और पूर्व पत्रकार हरिवंश , विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर संजीव जैन,मैं स्वयं और विज्ञान प्रसार के वैज्ञानिक और संचारक निमिष कपूर भी मौजूद थे । प्रसंग के तौर पर बता दूं कि अपने ज़माने की मशहूर समाचार पत्रिका रविवार के संस्थापक संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह थे और हरिवंश जी तथा मैं रविवार की उस टीम में थे ।


पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर बच्चा बाबू,आईआईएमसी के क्षेत्रीय निदेशक तथा प्रोफेसर और वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी कुमार के संयोजन में कार्यशाला का रूप निखर गया । दरअसल कम लोग ही लिखी जाने वाली, रेडियो पर सुनी जाने वाली और परदे पर देखी जाने वाली बोली में अंतर समझते हैं ।

इसी तरह रंगमंच की भाषा भी भिन्न होती है ।उनके शब्द और भाव अलग होते हैं और उनकी उपमाएं तथा प्रतीक अलग अलग होते हैं । मैने चार दिन तक अलग अलग सत्रों में इसे प्रतिभागियों को समझाने का प्रयास किया । अच्छी बात यह रही कि उन सभी ने भी अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई । उन्होंने अपनी ज़िंदगी के इर्द गिर्द बिखरे गुमनाम नायकों की बायोपिक बनाने की एक अभ्यास परीक्षा का भी सामना किया ।

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