प्रधानमंत्री मोदी की ‘वोकल फॉर लोकल’ अपील से स्थानीय कारीगरों में उत्साह, स्वदेशी उत्पादों की बिक्री बढ़ने की उम्मीद
मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
दीपावली का पर्व नजदीक आते ही क्षेत्र में त्योहार की तैयारियां तेज हो गई हैं। बाजारों में रौनक दिखाई देने लगी है। दुकानदारों से लेकर मिट्टी के दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और सजावटी सामान बनाने वाले कारीगरों तक में खासा उत्साह नजर आ रहा है। आने वाले रविवार को दीपावली का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इसे देखते हुए कुम्हार परिवारों ने भी अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।
मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगर इन दिनों दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। कोई चाक पर दीये तैयार कर रहा है तो कोई उन्हें सुखाने और रंग-रोगन करने में जुटा हुआ है। वहीं लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों को अंतिम रूप देने का काम भी तेजी से चल रहा है। कारीगरों की कोशिश है कि दीपावली से पहले अधिक से अधिक दीये और मूर्तियां तैयार कर बाजार तक पहुंचाई जा सकें, ताकि त्योहार के दौरान ग्राहकों को उनकी जरूरत का सामान आसानी से मिल सके।
इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दीपावली से पहले ‘मन की बात’ कार्यक्रम में देशवासियों से ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को मजबूत करने की अपील किए जाने से स्थानीय कारीगरों में भी नई उम्मीद जगी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से स्थानीय स्तर पर बने उत्पादों को खरीदने और स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने का आह्वान किया है। इससे मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों को उम्मीद है कि लोग इस दीपावली पर बाजार में मिलने वाली चाइनीज झालरों और अन्य कृत्रिम सजावटी सामान के साथ-साथ पारंपरिक मिट्टी के दीयों को भी प्राथमिकता देंगे।
दौलत राम प्रजापति ,फूल सिंह ,अमन सिंह, प्रताप सिंह अंबाड़ी निवासी हल्के राम प्रजापति, अमन प्रजापति, राहुल प्रजापति, छोटू प्रजापति सहित अन्य कलाकारों ने बताया कि उनका परिवार कई वर्षों से मिट्टी की लक्ष्मी जी, दिया सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने का काम साल भर चलता है। हमारा पुश्तैनी काम है जो बरसों से करते चले आ रहे हैं।

कारीगरों का कहना है कि मिट्टी के दीये केवल रोशनी का साधन नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और संस्कृति का प्रतीक हैं। इनकी खरीदारी से स्थानीय कुम्हार परिवारों को रोजगार मिलता है और वर्षों पुरानी पारंपरिक कला भी जीवित रहती है। त्योहार के इस मौसम में होने वाली बिक्री से उनके परिवारों की आजीविका भी जुड़ी हुई है।
दीपावली पर घर-आंगन को मिट्टी के दीयों से रोशन करने की परंपरा आज भी कायम है। ऐसे में स्थानीय कारीगरों को उम्मीद है कि इस बार लोग स्वदेशी उत्पाद अपनाकर ‘वोकल फॉर लोकल’ के संदेश को सार्थक करेंगे। इससे एक ओर दीपावली की पारंपरिक चमक बरकरार रहेगी, वहीं दूसरी ओर स्थानीय कारीगरों की मेहनत को भी उचित सम्मान और बाजार मिलेगा।
इनका कहना हे
हमारे यहां साल भर मिट्टी के लक्ष्मी जी, गणेश जी, दुर्गा जी और दिया बनाए जाते हैं यह हमारा पुश्तैनी काम है साल भर इसी में लगे रहते हैं यह हमारी रोजी-रोटी है हालांकि महंगाई के दौर पर लागत ज्यादा मुनाफा कम होने लगा है।
फूल सिंह प्रजापति स्थानीय निवासी अंबाडी
मैं और मेरा पूरा परिवार साल भर मिट्टी से बने हुए दिया, लक्ष्मी जी सहित कई मूर्तियां बनाते हैं। इसके अलावा भी और कई मूर्तियां सालभर मिट्टी की बनाई जाती है। थोड़ा मिट्टी मिलने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है महंगाई के कारण पहले अच्छी कमाई हो जाती थी लेकिन अब नहीं हो पाती है। लेकिन पुश्तैनी काम होने के कारण करना पड़ता है।
दौलत राम प्रजापति स्थानीय निवासी अंबाडी