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कुंवरगढ़ से कुंरा फिर कुंवरगढ,आदिवासी राजा की पहचान खोती विरासत हुईं पुनर्स्थापित

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– सांसद ओर विधायक का सपना हुआ साकार

सुरेंद्र जैन धरसीवां

छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़ में से प्रमुख गढ़ कुंवरगढ़ जो कभी आदिवासी गौड राजा कुंवरसिंह की रियासत हुआ करता था वह जहां एक ओर अपनी पहचान खो चुका था तो वहीं अपना नाम भी खो चुका था राजा कुंवरसिंह के नाम से प्रसिद्ध रहा कुंवरगढ़ अपना नाम अपनी पहचान खोकर कुंवरगढ़ से कुंरा बनकर रह गया था राजा कुंवरसिंह का प्राचीन किला जमीदोज हो चुका लेकिन अब इतिहास पुनर्स्थापित हो रहा है कुंवरगढ़ से कुंरा हुआ कुंवरगढ़ पुनः अपनी प्राचीन पहचान को प्राप्त करने लगा है जिसका श्रेय निःसंदेह एक मात्र भाजपा सरकार ओर भाजपा सरकार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ओर बर्तमान विधायक पद्मश्री अनुज शर्मा की मेहनत ओर उनकी लगन को जाता है।

वैसे तो अपनी पहचान खोकर कुंवरगढ़ से कुंरा बनकर एक समस्या ग्रस्त गांव बन चुके कुंवरगढ़ के अच्छे दिनों की शुरुआत तो छत्तीसगढ़ में भाजपा नीत रमन सरकार के समय ही हो चुकी थी जब 2003 में धरसीवां से देवजी भाई पटेल विधायक निर्वाचित हुए थे भाजपा विधायक देवजी भाई पटेल ने डॉ रमन सिंह की सरकार के कार्यकाल में कुरा का समुचित विकास कराया उसे एक समस्याग्रस्त गांव से नगर पंचायत का ताज पहनाया लेकिन तब भी एक कमी रह गई थी ओर वह थी अंतिम राजा कुंवरसिंह की विरासत को पुनर्स्थापित कर इसका नाम पुनः कुंवरगढ़ करने ओर कुछ ऐसा करने की जो राजा कुंवरसिंह के कुंवरगढ़ के गौरवशाली इतिहास से जन जन को अवगत करा सके ओर वह काम क्षेत्रीय विधायक अनुज शर्मा के अथक प्रयास से तब सफल हुआ जब यहां तीन दिवसीय कुंवरगढ़ महोत्सव का आगाज हुआ क्षेत्रीय सांसद बृजमोहन अग्रवाल जब शिक्षा मंत्री थे तब उन्होंने कुंवरगढ़ महोत्सव की बात कही थी लेकिन इसे पंख लगाने का काम किया विधायक अनुज शर्मा ने जिन्होंने अपने अथक प्रयासों से त्रिदिवसीय कुंवरगढ़ महोत्सव का आयोजन 31 मार्च से 2अप्रैल तक कराया जिसमे प्रदेश के मुखिया आदिवासी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित कर कुंवरगढ़ महोत्सव को ऐतिहासिक बना दिया।

आदिवासी राजा की रियासत ओर आदिवासी मुख्यमंत्री
कुंवरगढ़ महोत्सव में यह भी एक संयोग रहा है कि जिस कुंवरगढ़ के अंतिम गौड आदिवासी राजा कुंवरसिंह की विरासत को सहेजने ओर उनके गौरव इतिहास को पुनर्स्थापित करने की शुरुआत हुई तो वह भी तब हुई जब प्रदेश के मुखिया भी आदिवासी वर्ग से हैं एक आदिवासी राजा के गौरवशाली इतिहास का गुणगान उनकी रियासत को पुनः पहचान देने का काम एक आदिवासी मुख्यमंत्री के हाथों होने का भी बहुत बढ़िया संयोग रहा 31 मार्च को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राजा कुंवरसिंह को नमन करते हुए उनके गौरवशाली इतिहास का गुणगान किया
राजा कुंवरसिंह की रियासत की ये है पहचान
रायपुर-विलासपुर मार्ग पर स्थित कुँवरगढ़ प्राचीन छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों में से एक है। जिसे जनमानस में कुंरा के नाम से जाना जाता है। रायपुर जिले के धरसींवा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला यह नगर मात्र एक भौगोलिक इकाई नही बल्कि जीवंत आस्था और प्राचीन शिल्प का एक ऐसा केन्द्र है जहाँ आज भी बुजुर्गों की चौपालों पर बीते कल के अनसुलझे रहस्यो और देवताओं के महिमा की चर्चा होती है।

कुँवरगढ़ के इतिहास के केन्द्र में गोड राजा कुँवरसिंह का नाम स्वर्ण अक्षरो में अंकित है। उनके दौर में इस क्षेत्र में 126 तालाब हुआ करते थे, इनमें से रानी सागर तालाब राजा के रानी के सम्मान का प्रतीक है, तो वही बुढा तालाब जनजातीय संस्कृति के आराध्य बुढा देव के प्रति अटूट श्रद्धा को दर्शाता है।

प्रमुख धरोहर

यह जगह अपने बड़े तालाबों और बावड़ियों के लिए जानी जाती है, जिनमें रानी सागर, बुढ़ा तालाब और मामा-भांचा तालाब प्रमुख हैं। गाँव के पश्चिम में एक प्राचीन शिव मंदिर के खंडहर और कई सती शिलाखंड मौजूद हैं। कुँवरगढ की आधार शिला इस प्रकार रखी गई थी, कि चारो दिशाओ की दिव्य शक्तियों द्वारा संरक्षित रहे। नगर के उत्तर में कंकालीन, दक्षिण में माता चंडी, पश्चिम में माता महामाया और पूर्व में भगवान चतुर्भुजी विराजमान है। कुँवरगढ की ऐतिहासिक धरोहरो में लोक कथाओ के अनुसार गुप्त सुरंग भी उल्लेखनीय है, जो प्राचीन काल में सामरिक सुरक्षा का एक गोपनीय माध्यम थी।

सांस्कृतिक विशेषताः

यहाँ के मदिरों में नागरी लिपि के शिलालेख होने के प्रमाण मिलते हैं, जो इसकी प्राचीनता को दर्शाते हैं। विशेष रूप से भगवान चतुर्भुजी का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि कुँवरगढ की आत्मा है। ग्रामीण कथाओं के अनुसार इस भव्य मंदिर का निर्माण उस छहमासी रात और छहमासी दिन के युग में हुआ था, जब समय की गति आज जैसी नही थी। वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में स्थित यह मंदिर अपनी सूक्ष्म नक्काशी और प्राचीन वास्तु कला से शोध कर्ताओं को आज भी अचंभित करते है।

स्वतंत्रता संग्रामः

यह भूमि स्व. कंवल सिंह सेन, स्व. गुरुचरण सिंह छाबड़ा, दाऊ दानवीर तुलाराम आर्य और स्व. बिसाहू राम दुबे जैसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की कर्मस्थली रही है। यहाँ के बुजुर्गो की स्मृतियों में वह दौर आज भी किसी ताजा तस्वीर की तरह सुरक्षित है, जब हिन्दु मुस्लिम एकता केवल नारों तक सीमित नही थी, बल्कि उनके व्यवहार का अटूट हिस्सा थी। वे बड़े गर्व से बताते हैकि कैसे इद की खुशिया और मुहर्रम के गम में पुरा नगर एक हो जाता था। इस सदभाव की पराकाष्ठा यहा की एतिहासिक राम लीला देखने को मिलती है। कुवरगढ की राम लीला की नीव एक मुस्लिम परिवार द्वारा रखा जाना इस बात का जीवन्त साक्ष्य है कि यहा कि मिट्टी में आपसी प्रेम के बीच कितने गहरे धसे है।

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