यशवंत सराठे बरेली रायसेन
कैसे जलेंगे चूल्हे,कौन सुनेगा हमारा दुःख दर्द।
जी हां यह कहना है आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिकाओं का । आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका का का मानदेय केन्द्र और राज्य सरकार के द्वारा प्राप्त होता है केन्द्र सरकार के द्वारा 5000 ओर राज्य सरकार के द्वारा 5000मानदेय दिया जाता है पिछली भाजपा सरकार के द्वारा 3000मानदेय वढ़ाकर 13000 कर दिया दो माह तक मानदेय दिया गया ,उसके बाद दो माह से मानदेय दिया ही नहीं गया।
कार्यकर्ताओं का शोषण-–
कार्यकर्ताओं ने वताया कि हम कार्यकर्ताओं सहायिकाओं के साथ सरकार हमेशा अन्यायपूर्ण कार्य कर रही है स्वास्थ्य विभाग का काम हो या नगरपरिषद नगरपालिका, राजनैतिक रैलियों में महिलाएं इकट्ठा करने एवं अन्य कार्यक्रमों में विभागीय कार्य के अलावा काम लिया जाता है, शासकीय योजनाओं से लेकर बच्चों की देखभाल उसके वाद घर आंगन की चिंता में सभी कार्य करना पड़ते हैं जहां चाहे कोई भी विभाग हमको कार्य करने का हुक्म सुना देता है,हमारा एक तरह से शोषण किया जा रहा है।
मजदूर से भी वदतर स्थिति –
कार्यकर्ताओं को शासकीय कार्य का जितना भार सौंपा गया है उस हिसाब से मानदेय एक मजदूर की मजदूरी से भी कम है।
जमीनी स्तर के सभी कार्य शासन के योजनाओं के देते हैं बल
आगनबाड़ी कार्यकर्ता हर वो कार्य करती है जिससे जमानत से लेकर शासन-प्रशासन की योजनाओं को सफल किया जाता है।
चाहे गर्भवती माताओं की देखभाल हो बच्चों की देखभाल हो, धात्री माताकी देखभाल घर-घर जाकर शासन की योजनाओं की जानकारी देना,तरह तरह के सर्वे कार्य करना, टीकाकरण कराना ,दवा वितरण करना आदि जैसे कार्य करना पड़ते हैं।
सुनना पड़ता है उलाहना-
शासन की योजनाओं का लाभ हितग्राही को मिले इसलिए घर-घर जाकर वताना पड़ता है कभी कभी हितग्राहियों के अभद्र व्यवहार को भी सुनना पड़ता है।
दो माह से नहीं मिला मानदेय
कार्यकर्ताओं ने वताया कि हमें समय पर मानदेय नहीं मिलता है ओर दो माह से मानदेय नहीं दिया गया है जिससे हमारे घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गयी है इतने कम मानदेय में घर का चूल्हा जलाना भी मुश्किल ही नहीं बल्कि इतनी महंगाई में बच्चों की पढ़ाई लिखाई,विजली,टीवी, मोबाईल, कपड़े घर का खाना-पीना मेहमान नवाजी,एवं अन्य खर्चों की पूर्ति कर पाना मौत के वरावर है कई कार्यकर्ता घर से सम्पन्न है कमी ऐसी है जिनके घर में वे ही मानदेय पर ही निर्भर रहती है उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय है।
विभागीय खर्चों का भार
आंगनबाडी कार्यकर्ताओं का कहना है कि समय पर मानदेय नहीं मिलता है नहीं भवन किराया शहरों और ग्रामो में किराया भी ज्यादा है तीन हजार रुपए से कम में भवन मिलता ही नहीं है कार्यकर्ताओं को ग्रह से किराया लगाकर केन्द्र संचालित करना पड़ रहा है दो दो तीन तीन माह का भवन किराया भी नहीं दिया गया है बस भी कार्यकर्ता को नोकरी नचाने के लिये करना पड़ता है। अधिकारी हमेशा दवाव वनाने है छोटी जगह है कुर्सी नहीं है , रजिस्टर भी कार्यकर्ता को ग्रह से ख़रीदना पड़ता है शासकीय कार्य के लिये कोई भी फार्म या आवेदन हो वह स्वयं के खर्चे पर ही करना पड़ता है नहीं करें तो हमेशा नौकरी से हटाने की घण्टियों को सुनना पड़ता है।आख़िर अपना दुःख किसके सामने रखे कैसे हम घर परिवार और केन्द्र का संचालन करें।