रिपोर्ट धीरज जॉनसन,दमोह
दमोह शहर में आज भी प्राचीनता के प्रमाण उपलब्ध है जो इसकी पहचान भी है पूर्व के समय की इमारत,भवन, शिलालेख,जल प्रबंधन की तकनीक भी दिखाई देती है।
परंतु वर्तमान में इनमे से कुछ को संरक्षण की आवश्यकता प्रतीत होती है जिनमें मुख्यतः जल संरचनाएं भी है जो कहीं-कहीं बेहतर प्रबंधन और ध्यान न दिए जाने के कारण अपना अस्तित्व खोती जा रही है।

शहर के प्राचीन तालाब फुटेरा में आस पास की कॉलोनी से निकलने वाला गंदा पानी नालियों के जरिए प्रवेश करता है जिससे यह दूषित तो हो रहा है साथ ही इंसानों और जीव जंतुओं के लिए भी घातक साबित हो सकता है।निकट के रेल्वे लाइन के नीचे से आने वाला पानी करीब तीन चार वार्ड से यहां आता है। स्थानीय लोगों का ऐसा भी करना है कि मानव निर्मित गंदगी भी इसमें शामिल है इससे प्रतीत होता है कि इसे सफाई की जरूरत है जो अब तक नहीं हुई।लोग वाहनों को यहां धोते हुए भी देखे गए है। पूजन सामग्री विसर्जन की यहां उचित व्यवस्था न होने के कारण प्लास्टिक बैग सहित सामग्री तालाब में तैरती रहती है जिससे शहर में जल संरक्षण का प्राचीन उदाहरण अपना अस्तित्व को खोजता प्रतीत हो रहा है अब ऐसा लगता है कि जिस तरह से लोग इस तालाब में कचरा डालने लगे है इससे यह तालाब को कचरा घर के रूप में बदलते समय नहीं लगेगा।

फुटेरा तालाब संरक्षण समिति के सदस्य नित्या प्यासी बताते है कि वर्षो से यह तालाब गंदा पड़ा था यहां काई जमी थी और बदबू आती थी कोई यहां आना भी पसंद नहीं करता था, पानी इस्तेमाल योग्य भी नहीं था, 2020 में पहली बार स्थानीय कुछ सदस्यों ने पहले तो इसके आस पास के अतिक्रमण को मुक्त करवाने के लिए मशक्कत की इसमें कुछ सफलता भी मिली इसके बाद खुले में शौच को बंद करवाया जो स्वच्छता अभियान की धज्जियां उड़ा रहा था। समिति के सदस्यों ने तालाब के पास फैली मानव निर्मित गंदगी को रोकने के लिए अभियान चलाया जिसमें रोक टोक, जुर्माना और जागरूकता के प्रयास किए गए साथ ही फेंसिंग के साथ पौधारोपण भी किया। इसकी सफाई के लिए पिछले चार वर्षो से संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदारों को सूचित किया और आवेदन दिया जा रहा है पर लगता है सब सो रहे है किसी को भी जल स्रोत को संरक्षित करने की चिंता नहीं है कई बार तो स्थानीय मछुआ समिति के सहयोग से इसके कुछ हिस्सों को साफ किया जो उपयोगी भी सिद्ध हुआ, पर आज भी तालाब के अधिकांश क्षेत्र में जल कुंभी फैली हुई है और आस पास की कॉलोनी से आने वाला गंदा पानी भी तालाब को प्रदूषित कर रहा है।

इसके निकट ही हजारी की तलैया के हालात भी कुछ ऐसे ही है जहां भी गंदगी व्याप्त है और लोगों ने इसके आस पास रहवास बना लिए है। कहते हैं कि उस समय ऐसी तकनीक से हजारी की तलैया बनी थी कि उसके ओवर फ्लो का पानी फुटेरा तालाब में आता था और इस तालाब का अतिरिक्त पानी नहर के माध्यम से निकट के तालाब में जाता था जो वर्तमान में सिंगपुर तालाब में नाम से जाना जाता है कहते हैं यहां भी अतिक्रमण और गंदगी है।
हालांकि जिले भर में प्राचीन जल संरक्षण के बेहतरीन तरीके आज भी मौजूद है पर कुछ साल पहले बने हुए तालाबों के फूटने और कहीं इनके नाम पर औपचारिकता के समाचार भी सामने आए जिससे प्रतीत होता है कि जनहित की दुहाई देकर खानापूर्ति हो रही है जिसके परिणाम आनेवाले वर्षो में दिखाई दे सकते है।कुछ क्षेत्र तो ऐसे भी है जहां के लोग शुद्ध पेयजल के लिए जद्दोजहद कर रहे है। वैसे तो यहां सिंचाई परियोजनाओ पर भी काम जारी है कुछ स्थानों पर पानी पहुंचना प्रारंभ हो गया है परंतु जिस गति से जल संरक्षण के लिए पारकोलेशन टैंक,तालाब, स्टाप डैम इत्यादि पर राशि खर्च हुई उसके उत्कृष्ट परिणाम सामने नहीं आए।
*राय बहादुर हीरालाल द्वारा लिखित दमोह दीपक में जिक्र है* कि यहाँ आठ तालाब थे जिनमें शहर के उत्तर में फुटेरा तालाब सबसे बड़ा था, जो किसी बंजारे ने बनाया था। मन् 1878 में टामसन साहब डिपुटी कमिश्नर के समय में कोई 25000 रु. लगाकर तालाब और नहाने के घाट सुधारे गये थे । पुरैना तालाब को मुसलमानों ने बनाया था। उसी के पास दीवानजी का तालाब मराठा सूबेदार बालाजी दीवान का बनवाया है । हजारी तालाब भी मरहटों के समय का है। बाकी सरकारी राज्य में बने हैं। कई तालाब और बावलियों का पानी पीने लायक नहीं था इसलिए पीने से बीमारी होती थी, इसी दिक्कत के मिटाने को लिये यहाँ नल का प्रबंध किया गया।