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आस्था और अंधविश्वास के चलते होली के दहकते अंगारो से निकलते लोग, कहते है सेकड़ो साल पुरानी है यह परम्परा

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रिपोर्ट-देवेश पाण्डेय सिलवानी रायसेन

आस्था और अंधविश्वास के चलते होली के दहकते अंगारो से निकलते लोग । लोग कहते है सेकड़ो साल पुरानी है यह परम्परा । रायसेन जिले में तीन ग्रामो में होती है यह अनोखी परम्परा । बही लोग आस्था और अंधविश्वास के चलते जान जोखिम में डाल कर आग के अंगारो से गुजरते है । रायसेन जिले के एक ही विंधानसभा सिलवानी के तीन जगह से अलग अलग तस्वीर । सिलवानी तहसील के ग्राम महगवां और चंद्रपुरा की तस्वीर बही बेगमगंज के सेमरा ग्राम की तस्वीर । जहाँ लोग जान जोखिम ने डाल आस्था और अंधविश्वास के चलते होली के दहकते अंगारो से निकलते है।

रायसेन जिले के सिलवानी के दो ग्रामो में एवं वेगामगंज के एक ग्राम में अनोखे तरह से होली मनाई जाती है । यह परम्पर ग्राम चंद्रपुरा में 15 वर्ष से चली आ रही है बही ग्राम महगमा पांच सौ साल पुरानी परंपरा आज के आधुनिक युग मे भी जारी हैं। बही बेगमगंज के ग्राम सेमरा में भी 150 वर्षो से होली के दहकते अंगारो में से होकर गुजरते है ग्रामीण । होली का त्योहार मान्यताओं और परंपराओं का समागम है. देश के अलग-अलग हिस्सों में होली हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है. कहीं फूलों से होली खेली जाती है, तो कहीं पर लोग एक दूसरे पर लट्ठ बरसातें हुए होली खेलते हैं. लेकिन आपने कभी आग के जलते अंगारों पर चलकर होली खेले जाने के बारे में सुना है. इस पर यकीन कर पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. लेकिन सिलवानी तहसील के दो गांवो में होली के दिन अंगारों पर चलने की परंपरा है।
अंधविश्वास कहे या आस्था, लोगो का मानना है कि ग्रामीण आपदा और बीमारियों से दूर रहते हैं ।


सिलवानी और बेगमगंज में आस्था व श्रद्धा के चलते ग्रामीण धधकते हुए अंगारों के बीच से नंगे पैर निकलते है। ग्रामीणो की आस्था का आलम यह है कि नाबालिग बच्चों से लेकर महिलाएं उम्र दराज बुजुर्ग तक अंगारों पर नंगे पैर निकलते है लेकिन जलते हुए होलिका दहन के अंगारों पर निकलने के बाद भी बच्चों और महिलाओं से लेकर बुजुर्ग तक के पैर आग पर चलने के बाद भी किसी भी ग्रामीणों के पैर नहीं जलते और ना ही किसी भी गांव के व्यक्ति को कोई भी परेशानी नहीं होती है। सभी ग्रामीण बारी-बारी से आग पर से निकलते हैं।
रात्रि में होलिका दहन के बाद रात्री में सिलवानी तहसील से महज 14 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पंचायत हथौड़ा के ग्राम महगवा और महज 4 किमी दूर बसे ग्राम पंचायत डुंगरिया कला के ग्राम चंदपुरा का है। ग्राम चंदपुरा में ग्रामीण पिछले पंद्रह वर्षों से आग पर से निकलते आ रहे है और ग्राम महगवा में ग्रामीण करीब पांच वर्षों से आग पर चलते आ रहे हैं। ग्राम महगवा में लगभग तीन सौ से ज्यादा मकान है जिनकी आबादी लगभग एक हजार है। यहां प्रत्येक वर्ष होलिका दहन के बाद रात्रि में ही सभी ग्रामीण धधकते हुए अंगारों के बीच से ग्राम के बच्चों से लेकर बड़े बुर्जुग व्यक्ति तक बेधड़क होकर लगभग पांच सौ बरसों से होलिका दहन के बाद होलिका दहन के धधकते हुए अंगारों पर नंगे पैर गुजरते आ रहे है। बही बेगमगंज के ग्राम सेमरा में भी 150 वर्षो से लोग धधकते अंगारो से निकलते है ।लेकिन अंगारों केे बीच से निकालने के बाद भी किसी भी व्यक्ति या बच्चें को ना तो पैर जलते है और ना ही किसी भी ग्रामीणों को पैरों में जलन होती है बच्चों महिलाएं जलते हुए अंगारों पर ऐसे चलते हैं मानो जैसे फूलों पर चल रहे हो बेरोकटोक बिना किसी हिचक की ग्रामीण इस आस्था में बारी बारी से भाग लेकर निकलते आ रहे हैं और यह प्रथा कई वर्षों से आज भी निरंतर चालू बनी हुई है। ग्राम महगवा के चौराहे पर विधि विधान के साथ पूजा अर्चना के पश्चात ग्रामीणों के सहयोग से होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन को देखने के लिए आसपास के कई ग्रामों के ग्रामीण बड़ी संख्या में आयोजन को देखने के लिए एकत्रित होते है।


इसी तरह ग्राम चंदपुरा में भी लगभग 15 वर्षों से यह आयोजन हो रहा है। इस वर्ष आसपास के कई जिलों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित हुए और प्रसाद चढ़ाया और दहकते अंगारों से बूढ़े बच्चे, और जवान और महिलाएं भी अंगारों से निकलते हैं। और उनके मन में प्राकृतिक आपदाओ से मुक्त रहने का विश्वास रहता है। अनेकों वर्ष से हो रहा है आयोजन
ग्राम में करीब होलिका दहन के धधकते हुए अंगारों पर से नंगे पैर निकालने का सिलसिला करीब सेकड़ो वर्षो से चल हैं। क्यों और किसलिए यह जानलेवा आयोजन किया जाता है। इसकी सटीक जानकारी किसी भी ग्रामीण के पास नहीं है। लेकिन आस्था इतनी है कि पर्व के आने के कई दिन पूर्व से ही तैयारियां ग्रामीणों के द्वारा प्रारंभ कर दी जाती है बड़ी संख्या में ग्रामीण इस आयोजन में भाग लेते हैं। नहीं आती ग्राम पर प्राकृतिक आपदा
हालांकि धधकते अंगारों पर चलने की सही जानकारी को लेकर ग्रामीण स्पष्ट रुप से कुछ भी नहीं जानकारी देते है। लेकिन ग्राम के लोगो कहना है ग्राम में कभी भी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं आती है। सुख शांति समृद्धि के लिए हमारे बुजुर्गों द्वारा सैकड़ों वर्षों से यह प्रथा चली आ रही है इसी मान्यता के चलते प्रत्येक वर्ष होली दहन के बाद यह आयोजन ग्रामीणों द्वारा किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले सभी लोग अंगारों पर चलते हैं उसके बाद सभी एक दूसरे को रंग गुलाल लगाते हैं

 

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