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बड़ा मुद्दा: ‘राष्ट्रपति’ शब्द के लैंगिक औचित्य पर बहस, यह विवाद राजनीतिक या व्याकरणिक?-अजय बोकिल

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स्व. बाला साहब ठाकर ने एक सुझाव दिया था कि यदि राष्ट्रपति महिला हो तो उसे राष्ट्रपति के बजाए ‘राष्ट्राध्यक्ष’ कहा जाए। लेकिन इस पर विवाद हो सकता था। अब देश की नई राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के पदनाम की लैंगिकता पर बेवजह विवाद खड़ा किया जा रहा है।

देश में ‘राष्ट्रपति’ जैसे संवैधानिक शब्द को जेंडर न्यूट्रल (लिंग निरपेक्ष) घोषित करने की मांग दरअसल इस अत्यंत सम्मानित और मोटे तौर पर सर्वस्वीकृत शब्द को लेकर उठे विवाद को जिंदा रखने की कोशिश भर लगती है। देश के संवैधानिक इतिहास में यह तीसरी बार है, जब राष्ट्र के सर्वोच्च पदनाम के लैंगिक औचित्य को लेकर बवाल खड़ा किया जा रहा है।

पहला विवाद आजादी के पहले संविधान सभा में हुआ था, जब इस राष्ट्रपति शब्द को अंग्रेजी के ‘प्रेसीडेंट’ शब्द के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तावित किया गया था और काफी बहस के बाद उसे स्वीकार कर लिया गया था। दूसरी बार इस पर बवाल तब मचा, जब देश की पहली महिला राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल बनीं।

सवाल उठता कि उन्हें ‘राष्ट्रपति’ कैसे पुकारा जाए, क्योंकि वो तो एक महिला हैं? इसी विवाद में स्व. बाला साहब ठाकर ने एक सुझाव दिया था कि यदि राष्ट्रपति महिला हो तो उसे राष्ट्रपति के बजाए ‘राष्ट्राध्यक्ष’ कहा जाए, लेकिन इस पर विवाद हो सकता था। अब देश की नई राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के पदनाम की लैंगिकता पर बेवजह विवाद खड़ा किया जा रहा है। या यूं कहे कि एक राजनीतिक विवाद को व्याकरणिक विवाद में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है। इस बात की तह में जाना जरूरी है कि आखिर प्रेसीडेंट के हिंदी समकक्ष शब्द के रूप में ‘राष्ट्रपति’ शब्द का औचित्य क्या है और क्यों है?

राष्ट्रपति’ शब्द को बवाल

‘राष्ट्रपति’ शब्द को लेकर ताजा बवाल की शुरुआत लोकसभा में कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी के उस विवादित बयान से हुई, जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ‘राष्ट्रपत्नी’ कहकर सम्बोधित किया। भाजपा ने इसे जानबूझ कर एक महिला राष्ट्रपति का अपमान बताया और चौधरी से इसके लिए माफी मांगने की मांग की तो खुद चौधरी और उनकी पार्टी कांग्रेस एकदम बैकफुट पर आ गए। क्योंकि जो चौधरी ने कहा वो अनौपचारिक रूप में मजाक के तौर पर भले कह दिया जाता हो, लेकिन एक संवैधानिक पद के नामकरण को लेकर अपने आप में बहुत निम्नस्तरीय टिप्पणी थी।

बाद में चौधरी ने स्वयं राष्ट्रपति मुर्मू को चिट्ठी लिखकर यह कहकर माफी मांगी कि चूंकि वो स्वयं बंगला भाषी हैं, इसलिए शब्द में निहित लिंगभेद ठीक से समझ नहीं पाए। यह सही है कि बांग्ला में स्त्री और पुरुष सम्बोधनों और क्रियापदों में वैसा लिंग भेद नहीं है, जैसा कि हिंदी में है। अंग्रेजी में भी कई शब्द लिंग निरपेक्ष ही हैं, लेकिन हिंदी की प्रकृति अलग है। इसीलिए महिला और पुरुषों को लेकर कार्यकारण शब्दों और क्रियापदों में अंतर होता है।

अधिरंजन चौधरी ने जो कहा, वह केवल ‘भाषागत अज्ञान’ अथवा वाचिक असावधानी भर नहीं थी, उसमें कहीं न कहीं राजनीतिक उपहास और गहरे कटाक्ष का भाव भी था। इसी भाव को जिंदा रखने के लिए मप्र. के भिंड के एक कांग्रेस नेता देवाशीष जरारिया ने अब खुद राष्ट्रपति को पत्र लिखकर मांग की है कि राष्ट्रपति शब्द को ‘लैंगिक रूप से तटस्थ’ घोषित किया जाए अर्थात यह शब्द न तो पुल्लिंग होगा और न ही स्त्रीलिंगी।

संविधान की मूल ड्राफ्टिंग

हमारे संविधान की मूल ड्राफ्टिंग अंग्रेजी में है। इसमें देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए संविधान रचनाकारों ने अंग्रेजी के प्रेसीडेंट’ शब्द को अंगीकार किया। इस पर कोई विवाद नहीं रहा। लेकिन संविधान के हिंदी प्रारूप में प्रेसीडेंट’ के समानार्थी शब्द को लेकर संविधानकारों में मतभेद था। परिणामस्वरूप कई सुझाव आए, जिनमें राष्ट्रप्रधान, कर्णधार, सरदार, चीफ एक्जीक्युटिव, राष्ट्राध्यक्ष आदि थे। लेकिन किसी पर भी आम सहमति नहीं बनी। इसका कारण यह हो सकता है कि सुझाए गए किसी भी शब्द में देश के सर्वोच्च पद में निहित गरिमा और उसकी अपेक्षित प्रतिध्वनि महसूस नहीं हो रही थी।

वैसे भी हिंदी में ‘पति’ शब्द केवल दाम्पत्य जीवन के ‘पति’ तक सीमित नहीं है। पति शब्द मूल रूप से संस्कृत की ‘पा’ धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है-रक्षा करना। गृहस्थ जीवन के संदर्भ में चूंकि यह अपनी स्त्री के संरक्षण से सम्बन्धित है, इसलिए ऐसा करने वाले को ‘पति’ कहा गया है। पति परिवार का मुखिया भी माना जाता है। हालांकि समय और बदलते दायित्वों के साथ पति शब्द का काफी विस्तार हुआ और समाज ने उसे ‘अधिपति’ या ‘स्वामी’ के अर्थ में स्वीकार कर लिया।

इसी संदर्भ में ‘राष्ट्रपति’ शब्द से तात्पर्य राष्ट्र के संरक्षक और मुखिया से है न कि किसी पुरुष मात्र या परिवार विशेष के मुखिया से। क्योंकि यदि इसे संकुचित भाव से लिया जाएगा तो कल को इस देश में कोई महिला सेनापति बनी तो उसे किस पदनाम से सम्बोधित करेंगे?

कुलपति, सभापति, करोड़पति, न्यायाधिपति, उद्योगपति आदि कई शब्द हैं, जो अपने आप में लिंग निरपेक्ष हैं। इसकी अलग से व्याख्या करने या वैसी उद्घोषणा करने की मांग अपने आप में मूर्खतापूर्ण ही है। इसी तरह महिला मंत्री को मंत्राणी कहना भी सही नहीं है।
कांग्रेस नेता अधीर रंजन के विवादित बोल से मचा बवाल।
कांग्रेस नेता अधीर रंजन के विवादित बोल से मचा बवाल। –
भाषा के आधार पर समझिए

किसी भी भाषा में शब्द का अर्थ उसमें निहित भाव और आशय से प्रकट होता है। कुछ अति शुद्धतावादी अथवा सहज भाषा के अज्ञानी इसमें भी गड़बड़ करते हैं, जैसे कि महिला अध्यक्ष को ‘अध्यक्षा’ कहना। हालांकि हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हिंदी में ऐसे लिंग निरपेक्ष शब्दों का कोई सुस्पष्ट मानकीकरण नहीं है।
उदाहरण के लिए अगर राष्ट्रपति पद के एक ही शब्द के उपयोग का आग्रह है तो बोल-चाल में इस्तेमाल होने वाले कई शब्द जैसे कि शिक्षिका, अध्यापिका, नेत्री, व्यवस्थापिका, प्राचार्या, अध्यक्षा, लेखिका, कवियित्री आदि को लेकर कोई स्पष्ट नियम नहीं है। डाॅक्टर, वकील, इंजीनियर, पुलिस, सिपाही, सैनिक, चित्रकार, वाहन चालक, कार्यकर्ता आदि शब्दों को सहज भाव से लिंग निरपेक्ष मान लिया गया है।

यदि राष्ट्रपति’ नामक संज्ञा को लिंग निरपेक्ष घोषित करना उचित माना जाए तो फिर उपरोक्त सभी शब्दों के उपयोग के बारे में भी एक निश्चित नियम बनाना पड़ेगा।

दरअसल यह झगड़ा शब्दों के प्रचलित अर्थ से ज्यादा लिंग विचारधारा ( जेंडर आइडियालाॅजी) को लेकर है। बताया जाता है कि 1975 में एनसीईआरटी ने अंगरेजी के ‘गैर लिंगी’ ( नाॅन सेक्सिस्ट) शब्दों को लेकर एक गाइड लाइन जारी की थी। ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में भी इस पर काम हुआ है। परंपरागत रूप से यह माना जाता है कि पुल्लिंग शब्द आम तौर पर लिंग निरपेक्ष ही होते हैं। लेकिन इसके पीछे बड़ा कारण पितृसत्तात्मक परंपरा का स्वीकार और पुरूषों के ही समाज का नियंता होने की मान्यता है।

इसे मोटे पर स्त्रियों ने भी मंजूर कर लिया है या उन्हें उन्हें ऐसा करने पर विवश होना पड़ा है। शायद सौंदर्य, ममत्व और समर्पण ही ऐसे भाव हैं, जहां स्त्री के गुणों और अधिकारिता को मानक रूप में स्वीकार किया जाता है। बाकी शब्दों, संज्ञाओं में पुरुषत्व और पुरुष प्रधान मानसिकता ही हावी है।

यद्यपि इस बारे में जानकारों का तर्क है कि केवल संवैधानिक पदों के बारे में ही लिंग निरपेक्षता का नियम लागू होता है अन्य में नहीं। लेकिन इस सम्बन्ध में किसी भी तरह के कनफ्यूजन और खासकर गैर हिंदी भाषियों के असमंजस को दूर करने के लिए ऐसी संज्ञाओं और पदनामों की स्पष्ट व्याख्या और दिशा-निर्देश जरूरी हैं।

व्याकरण की दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण है। हालांकि कुछ मामलों में ऐसे लिंग निरपेक्ष शब्द आम बोलचाल में इस्तेमाल भी होने लगे हैं मसलन दल, गुट, कारोबार, बैठक आदि। बेहतर यही है कि ‘राष्ट्रपति’ शब्द को लेकर राजनीतिक तलवारबाजी करने के बजाए इसे भाषाशास्त्रियों और समाज पर छोड़ देना चाहिए। वैसे भी संवैधानिक पदों पर लैंगिक औचित्य का विवाद खड़ा करना बेकार की कवायद ही है।

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