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मानस के स्वाध्याय से समझें जीवन का वास्तविक अर्थ – पं. रामगोपाल तिवारी

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– प्रगत शैक्षिक अध्ययन संस्थान में हुए प्रवचन, रामत्व को अपनाने और देहवाद से ऊपर उठने का दिया संदेश

भोपाल। प्रगत शैक्षिक अध्ययन संस्थान भोपाल में विद्वान मानस मर्मज्ञ कथा प्रवक्ता पंडित रामगोपाल तिवारी महाराज के प्रेरक व्याख्यान आयोजित हुए। प्रवचन देते हुए पंडित तिवारी महाराज ने कहा कि जीवन में देह नहीं, बल्कि प्राण और आत्मतत्व का महत्व है। उन्होंने बताया कि सीता जनक की पुत्री होते हुए भी जगत जननी कही जाती हैं और इस रहस्य को समझने के लिए रामचरितमानस का स्वाध्याय आवश्यक है। उन्होंने कहा कि रामकथा सुनना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भवसागर से पार होने का माध्यम है।

व्याख्यान कार्यक्रम में संस्थान के संचालक डॉ. रामकुमार स्वर्णकार ने संस्थान की परंपराओं और गतिविधियों की जानकारी दी तथा बताया कि संस्थान में पढ़ाई के साथ ही मनुष्य जीवन कल्याण व उत्थान के लिए अनेक कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। कथा प्रवक्ता पंडित तिवारी महाराज ने अपने व्याख्यान में राम और रावण के अंतर को समझाते हुए कहा कि जो व्यक्ति वेद और धर्मशास्त्र के विरुद्ध चलता है, वह रावण के मार्ग पर है, जबकि जो धर्म के अनुसार चलता है, वही रामत्व को प्राप्त करता है। मनुष्य जन्म को दुर्लभ बताते हुए उन्होंने कहा कि इसे व्यसन और विकारों में नष्ट करना उचित नहीं है। पंडित तिवारी ने कहा कि क्रोध और ज्ञान एक साथ नहीं रह सकते। यदि मन में ज्ञान है तो क्रोध स्वतः समाप्त हो जाता है। उन्होंने समुद्र पार करने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि राम ने प्रतिशोध नहीं, बल्कि प्रीति के लिए क्रोध प्रकट किया था। प्रवचन के दौरान उन्होंने जड़ और चेतन के समन्वय, सृष्टि की रचना के क्रम तथा विभिन्न चौपाइयों के अर्थ पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन संस्कारों से बंधा होता है और इन्हीं संस्कारों से समाज में संतुलन बना रहता है। नारी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि नारी शक्ति का प्रतीक है और उसके बिना पुरुष का अस्तित्व अधूरा है। पति-पत्नी को जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए बताते हुए उन्होंने आपसी विश्वास, समन्वय और संतुलन को आवश्यक बताया।

उन्होंने रामकथा के प्रसंगों का उदाहरण देते हुए कहा कि ताड़का क्रोध की, मंथरा लोभ की और शूर्पणखा काम की वृत्ति का प्रतीक हैं। इन प्रवृत्तियों से बचकर ही मनुष्य कल्याण के मार्ग पर चल सकता है। अंत में उन्होंने कहा कि वर्तमान में बढ़ती समस्याओं के लिए स्वयं मनुष्य जिम्मेदार है और सही नियत व संस्कारों से ही समाज में सुधार संभव है। प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में शिक्षक तथा बीएड एमएड प्रशिक्षणार्थी उपस्थित रहे। आयोजन में महासदन प्रभारी ललित नारायण बुधौलिया ने संचालन किया, जबकि डॉ. संचिता जैन ने आभार व्यक्त किया।

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