-पहले इन फसलों में या तो कीटनाशक का उपयोग नहीं होता था या बहुत कम होता था लेकिन अब ज्यादा होने लगा है
मुकेश साहु दीवानगंज रायसेन
समय के साथ खेती के तौर-तरीकों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जिन फसलों जैसे गेहूं और चना में किसान बहुत कम या लगभग कीटनाशकों का उपयोग नहीं करते थे, अब उन्हीं फसलों में कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। किसानों का कहना है कि मौसम में बदलाव, नए कीट-रोगों का खतरा और बेहतर उत्पादन की चाह ने उन्हें यह कदम उठाने के लिए मजबूर किया है।
क्षेत्र के किसानों के अनुसार पहले गेहूं और चना को अपेक्षाकृत सुरक्षित फसल माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में फसलों पर रोग और कीटों का प्रकोप बढ़ा है। इसके चलते उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ रहा था। नुकसान से बचने और अधिक उपज पाने के लिए अब किसान कीटनाशकों का सहारा लेने लगे हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कीटनाशकों का सीमित और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग जरूरी है। बिना सलाह और अधिक मात्रा में उपयोग करने से जमीन की उर्वरता पर असर पड़ सकता है और पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है। किसानों को समय-समय पर कृषि विभाग से सलाह लेकर ही दवाइयों का प्रयोग करना चाहिए।

इधर कई किसानों का कहना है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा और बढ़ती लागत के बीच बेहतर फसल उत्पादन उनकी प्राथमिकता बन गई है। इसलिए वे आधुनिक तकनीक और दवाइयों का उपयोग कर रहे हैं ताकि नुकसान कम हो और आमदनी बढ़ सके। दीवानगंज, अंबाडी, सेमरा, नरखेड़ा, जमुनिया ,निनोद, बरजोरपुर, सरार ,कयामपुर, संग्रामपुर, करैया , गिदगढ़,सत्ती ,टोला , सहित 50 गांव के किसान अब अपनी फसलों में किटनाशक का छिड़काव कर अधिक पैदावार उत्पन्न करने की कोशिश कर रहे हैं। बार-बार मौसम बदलने के कारण फसलों में कई बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है जिससे कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है।