आलेख
अरुण पटेल
बिहार के विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक एवं रिकार्ड तोड़ चकाचैंध करने वाली जीत के बाद वहां मध्यप्रदेश से गये नेताओं ने लम्बे-चैड़े दावे करना चालू कर दिया है और कांग्रेस के नेता भी इस पर अपनी बात अपने-अपने ढंग से कह रहे हैं। इन सबसे बेफिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अब सधे हुए कदमों से पश्चिम बंगाल का ममता बनर्जी का किला फतह करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

लम्बे समय से भाजपा को उम्मीद थी कि कभी न कभी बंगाल में कमल खिलेगा और अब उन्हें लग रहा है कि यही सबसे अच्छा मौका रहेगा, क्योंकि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में जिस ढंग से इंडिया गठबंधन का बिहार में सफाया हुआ है उससे भाजपा की उम्मीदें और बढ़ गयी हैं। हालांकि ममता बनर्जी न तो तेजस्वी हैं और न ही राहुल। उनका अपना मैदानी नेटवर्क भी है और कार्यकर्ताओं की लम्बी फौज भी है, जो कि दीदी के लिए समर्पित है। इंडिया गठबंधन में बिहार की हार के बाद क्या एकजुटता बनी रहती है या बिखराव की शुरुआत होती है इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।

बिहार के रण को फतह करने के लिए मध्यप्रदेश के कई प्रमुख नेताओं को भाजपा ने चुनावी मैदान में झोंक दिया था। मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव तो एक प्रकार से वहां डेरा ही डाल दिये थे। उन्होंने 25 विधानसभा सीटों पर 25 सभायें कीं और दो से ज्यादा रोड-शो किए, उनके खाते में यह दर्ज हो गया कि उनमें से 21 क्षेत्रों में एनडीए गठबंधन को सफलता मिली। उनकी उपलब्धियों में सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि पश्चिमी चंपारण की तीन सीटें जो मुस्लिम बहुल थीं और आरजेडी के प्रभाव क्षेत्र वाली मानी जाती थीं वहां पर एनडीए को जीत मिली। नरकटिया तो एक ऐसी सीट थी जहां पिछले दो बार एनडीए की झोली खाली रही थी वहां पर इस बार एनडीए के प्रत्याशी ने जीत दर्ज की। ऐसे ही नवादा जिले की हिसुआ विधानसभा सीट पर पिछली बार भाजपा प्रत्याशी को पराजय मिली थी लेकिन इस बार वह सीट भी भाजपा के खाते में गई।

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सांसद वी.डी. शर्मा को बिहार के तीन लोकसभा क्षेत्रों बेगूसराय, खगरिया और मुंगेर में जिम्मेदारी सौंपी गई थी, यहां उन्होंने मध्यप्रदेश की तरह बूथ मैनेजमेंट फार्मूले को आजमाया जो बिहार में भी कारगर रहा। यहां 17 सीटों पर एनडीए को जीत हासिल हुई, कई सीटों पर जीत-हार का अंतर काफी भारी-भरकम रहा। क्षेत्रीय सह-संगठन मंत्री अजय जामवाल को सारणी चम्पारण की 45 सीटों की जिम्मेदारी दी गई थी, यहां भी एनडीए को अच्छी सफलता प्राप्त हुई। बिहार चुनाव में एनडीए की जीत पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान मैंने जो देखा रिजल्ट भी उसके ही अनुकूल आये और यह कांग्रेस व उनके सहयोगियों को एक सबक है कि जमीन से जुड़ कर राजनीति करो, हवा में रहोगे तो हवा में उछाल दिये जाओगे, यही उनका हाल हुआ। उनका यह भी कहना था कि शादी के लिए घोड़ी, बैंड-बाजा, बारात सब कुछ था लेकिन दूल्हा राहुल गांधी भाग गया। बिहार की जनता केवल सुशासन चाहती है और उसी का यह परिणाम है। जीत से उत्साहित मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की सोच है कि बिहार की जनता ने राहुल गांधी और कांग्रेस को पूरी तरह नकार दिया। विपक्षी दल और कांग्रेस को उन्होंने सलाह दी कि वे अपने नेतृत्व की भूमिका पर विचार करें, जिसके नेतृत्व में देश व प्रदेशों में एक के बाद एक लगातार हार मिल रही है। इस सबके उलट मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी की प्रतिक्रिया थी कि जनता का जनादेश और एसआईआर प्रक्रिया का सीधा-सीधा असर दिख रहा है। देश में सवाल उठ रहा है कि लोकतंत्र देश में कैसे बचेगा, वोट चोरी से कैसे बचा जायेगा। भाजपा, नरेंद्र मोदी और चुनाव आयोग की मिलीभगत से पहले धारणा बनाई जाती है और फिर चुनाव को लूटने की कोशिश होती है। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने औरंगाबाद और गया जिले में सभाएं की थीं लेकिन यहां कांग्रेस को असफलता हाथ लगी।

– लेखक मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हैं।