मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
भोपाल विदिशा हाईवे 18 पर स्थित पर बैरखेड़ी चौराहे पर भागवत कथा के चौथे दिन कथा वाचक आचार्य पंडित सुबोध कांत कपिल ने कहा कि सुखदेव जी के जन्म की कथा सुनते हुए कहा कि कलयुग में भागवत महापुराण कल्पवृक्ष से भी बढ़कर है। कथा अर्थ, धर्म, काम के साथ साथ भक्ति और मुक्ति प्रदान कर जीव को परम पद प्राप्त कराती है।
श्रीमदभागवत पुस्तक नहीं साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप है। इसके एक एक अक्षर में भगवान समाए हुए हैं। इस कथा को सुनना दान, व्रत, तीर्थ से भी बढ़कर है। धुंधकारी जैसे महापापी, प्रेतात्मा का उद्धार हो जाता है। मनुष्य से गलती होना बड़ी बात नहीं लेकिन गलती को समय रहते सुधार करना जरूरी है। ऐसा नहीं किया तो गलती पाप की श्रेणी में आ जाती है। भागवत के श्रोता के अंदर जिज्ञासा होनी और श्रद्धा होनी चाहिए। परमात्मा दिखाई नहीं देता पर हर किसी में बसता है। हमारे पूर्वजों ने सदैव ही पृथ्वी का पूजन और रक्षा की। इसके बदले पृथ्वी ने मानव का रक्षण किया। हिंदू धर्म में श्रीमद्भागवत पढऩे व सुनने का विशेष महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रृंगी ऋषि ने जब राजा परीक्षित को सात दिन में मृत्यु का श्राप दिया, तब शुकदेव मुनि ने मुक्ति के लिए उन्हें ये पुराण सुनाया था। पिता ऋषि वेदव्यास से ज्ञान पाकर देवताओं को महाभारत की कथा भी मुनि शुकदेव ने ही सुनाई थी। बहुत कम लोग ही ये जानते हैं कि मुनि शुकदेव एक शुक यानि तोता थे, जो भगवान शंकर के डर से 12 वर्ष तक मां के गर्भ में रहे थे। मुनि शुकदेव भगवान वेदव्यास के पुत्र थे। एक समय जब भगवान शिव अमर कथाएं सुना रहे थे तो पार्वती जी तो सो गईं, पर शुक उन्हें सुनकर हां करता रहा। जब भगवान शंकर ने देखा तो वे उसे पकड़ने भागे ये देख शुक व्यासजी के आश्रम में पहुंचकर सूक्ष्म रूप से उनकी पत्नी के मुंह में समा गया मान्यता है कि यही शुक फिर व्यासजी के अयोनिज पुत्र के रुप में प्रकट हुए। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गर्भ में ही इन्हे वेद, उपनिषद, दर्शन, पुराण आदि का ज्ञान हो गया, पर माया के डर से ये 12 वर्ष तक गर्भ में ही छिपे रहे। बाद में भगवान श्रीकृष्ण से माया के प्रभाव से मुक्त रहने का आश्वासन मिलने पर ही ये बाहर निकले। मुनि शुकदेव जन्मते ही श्रीकृष्ण व माता- पिता को प्रणाम कर तपस्या के लिये जंगल में चले गए। तभी एक समय शुकदेवजी ने भी उस श्लोक को सुन लिया। इसके बाद श्रीकृष्णलीला के आकर्षण से बंधकर वे फिर से अपने पिता श्रीव्यासजी के पास लौट आये। श्रीमद्भागवत महापुराण के अठारह हजार श्लोकों का विधिवत अध्ययन करने के बाद उन्होंने राजा परीक्षित को इसे सात दिन में सुनाया, जिसे सुन राजा परीक्षित भगवान के परमधाम पहुंचे। तब से ही साप्ताहिक भागवत सुनने का प्रचलन शुरू हुआ।