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बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानकर मनाया जाता हे दशहरा

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आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा मनाया जाता है. इस त्योहार को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानकर मनाया जाता है. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने लंकापति रावण का वध कर माता सीता को उससे आजाद कराया था. इस अवसर पर हर साल लंकापति रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है. उत्तर भारत में इस त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. इस साल दशहरा 12 अक्टूबर यानी आज मनाया जा रहा है. आइए जानते हैं कि इस साल विजयादशमी पर कौन से शुभ मुहूर्त और योग बन रहे हैं

.विजयादशमी की दो कथाएं बहुत ज्यादा प्रचलित हैं. पहली के कथा के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल की दशमी तिथि को प्रभु श्रीराम ने रावण की मारकर लंका पर विजयी परचम लहराया था. विजयदशमी के ठीक 20 दिन बाद दीपावली का पर्व मनाया जाता है. कहते हैं कि इस दिन भगवान श्रीराम 14 साल का वनवास काटकर माता सीता के साथ अयोध्या वापस आए थे. और दूसरी कथा के अनुसार, विजयादशमी के दिन आदि शक्ति मां दुर्गा ने दस दिन तक चले भीषण संग्राम के बाद महिषासुर राक्षस का वध किया था. कहते हैं कि तभी से विजय दशमी मनाने की परंपरा चली आ रही है.

शास्त्रों के अनुसार दशहरे के दिन इन्द्र भगवान ने असुरों पर विजय प्राप्त की थी। महाभारत का युद्ध भी इसी दिन प्रारम्भ हुआ था। अर्जुन ने अपनी निपुणता के आधार पर द्रोपदी को स्वयंवर में भी विजयादशमी के दिन ही जीता था। महाराजा छत्रपति शिवाजी ने भी इसी दिन देवी दुर्गा को प्रसन्न कर तलवार प्राप्त की थी। राजा विक्रमादित्य ने दशहरे के दिन ही देवी की पूजा की थी।
इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार भी किया था। इस पर्व पर माता दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन, अपराजिता देवी का पूजन, शस्त्र पूजन, विजय यात्रा, शमी पूजन, श्रीराम पूजन, नीलकंठ दर्शन आदि क्रियाएं अपनी-अपनी मान्याताओं एवं परम्परा के अनुसार सम्पन्न की जाती है। विजयादशमी के विजय मुहूर्त में व्यापार, प्रतिष्ठान आदि कोई भी नया कार्य प्रारम्भ करने पर उसमें सौ प्रतिशत सफलता मिलती है। 

रावण की शक्ति समाहित होती है राम और सीता में – विजयादशमी पर्व भगवान राम द्वारा रावण का वध और माता सीता अर्थात् उनकी शक्ति उनके केन्द्र बिन्दु में है। सीता समस्त स्त्री वर्ग को परिभाषित करती है, ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार सीता न सिर्फ प्रभु राम की भार्या हैं, बल्कि नारी रूपी दिव्य शक्ति हैं, इस शक्ति को अनेक नामों से जाना गया है, मातुलुंगी, अग्निगर्भा, रत्नावली, धरणीजा, भूमिसुता, जानकी, वैदेही, सीता, पद्मा, मैथली, अयोनिजा, रामवल्लभा आदि। स्पष्ट है कि जहां कहीं भी शक्ति का वास है, वहीं सीता का निवास है। यही कारण है कि शारदीय नवरात्र में नौ दिन पर्यन्त शक्तिस्वरूपणी सती, सीता की नौदुर्गों के रूप में आराधना, उपासना कर सम्पूर्ण सृष्टि को शक्ति का एहसास कराने की मान्यता दी गई है। कृष्ण की राधा, राम की सीता और दुर्गा के नाना रूपों में कोई विभेद नहीं है। रावण स्वयमेव शिव और शक्ति का उपासक था, अतएव उसका वध नहीं अपितु उसकी शक्ति राम और सीता की शक्ति में समाहित हो गई, यही रावण वध का दर्शन है।

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