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मजदूर से बनी सरपंच फिर बनी मजदूर,घर से पैदल फैक्ट्री आती जाती हे

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सुरेन्द्र जैन धरसीवा रायपुर

एक ऐंसी ग्राम पंचायत जिसमे लगभग तीस बड़ी ओधौगिक इकाइयां ओर जायसवाल निको स्टील प्लांट जैंसी बड़ी फेक्ट्री सामिल हो उस ग्राम पंचायत का मजदूर रहते सरपंच बनना ओर फिर किसी फेक्ट्री में मजदूर बनकर दो वक्त की रोजी रोटी कमाना मेहनत करना क्या बर्तमान समय मे ऐंसा सुनना कुछ अटपटा सा नहीं लगता लक़ीन ये सच है और यह सत्य कहानी है एक पूर्व आदिबासी महिला सरपंच की।इस पूर्व आदिवासी महिला सरपंच की कहानी जानने के पहले यह भी जानना जरूरी है कि सांकरा ऐंसी ग्राम पंचायतों में शुमार रखती है जहां सरपंच चुनाव जीतने लाखों रुपये पानी की तरह बहाया जाता है दारू मुर्गा से लेकर नगद नारायण का दौर चुनाव में सर चढ़कर बोलता है इसी कारण एक बार जो सरपंच बनता है उसके बारे न्यारे हो जाते हैं वो जमीन से आसमान पर पहुच जाता है और गांव जमी में धंसता जाता है बाबजूद इसके आदिबासी महिला सरपंच रहीं श्रीमति सोनिया धुरू की कहानी पूरी तरह अलग है।बात उस समय की है जब सोनिया धुरू एक छोटी सी रत्ना इंजीनियरिंग नामक फेक्ट्री में मजदूरी करती थी साल 2010 में ग्राम पंचायत आदिबासी वर्ग को आरक्षित हुई तब यहां दो ही आदिवासी महिलाएं थी सोनिया धुरू का प्रेम विवाह अन्य जाति में होने से वह स्वयं को उसी जाति का समझती थी इस कारण एक ही महिला आदिबासी के निर्विरोध की चर्चा आम थी तभी एक पत्रकार को पता चला कि रत्ना फेक्ट्री में काम करने वाली आदीवासी महिला श्रमिक का प्रेम विवाह सतनामी समाज के पुनेन्द्र के साथ हुआ है स्थानीय पत्रकार ने उन्हें अवगत कराया कि अंतरजातीय विवाह से जाति नहीं बदलती है तब उन्होंने सांकरा पंचायत से चुनाव में नामांकन दाखिल किया बड़ी संख्या में आपत्तियां लगी लेकिन सब आपत्ति निरस्त हुई दो आदिबासी महिलाओं में मुकाबला हुआ जिसमें श्रीमति सोनिया धुरू की जीत हुई वह पहली महिला आदिबासी सरपंच बनी।उन्होंने 5 साल तक सरपंच रहकर गांव के लोगो को कभी पेयजल के लिए परेसान नहीं होने दिया अंतिम छोर तक उनके कार्यकाल में लोगो को भरपूर पेयजल मिला। 2010 से 2015 तक सरपंच रहकर भी उनका कचचा घर जस का तस रहा।पूरी निष्ठा और ईमानदारी से 5 साल सरपंच की कुर्सी संभाली ओर 2015 के बाद से वह पुनः परिवार चलाने फेक्ट्रियो में मेहनत मजदूरी करने जाने लगीं ।आज भी वह रोज की तरह सुबह आठ बजे फेक्ट्री में मजदूरी करने डेढ़ किलो मीटर पैदल ही जाती हैं जबकि इनके अलावा जो भी अब तक सरपंच रहे उनकी आर्थिक रीढ़ इतनी मजबूत हो गई कि वह कार से नीचे नहीं उतरते।

 

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