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मोक्ष कल्याणक 16 दिसम्बर को, गजरथ फेरियां आज निकलेगी

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सागर। कर्रापुर में चल रहे पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव के अंतिम दिन 16 दिसंबर को सुबह 7:16 पर मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा, आचार्य श्री की पूजन प्रवचन के उपरांत हवन होगा और दोपहर में गजरथ फेरी में सात फेरों के बाद पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव का समापन हो जाएगा। पाषाण से भगवान बनने के सात दिवसीय कार्यक्रम में 63 प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हुई हैं।

मुनि सेवा समिति के सदस्य मुकेश जैन ढाना ने बताया कि सुबह मोक्ष कल्याणक के उपरांत मुनिसंघ के प्रवचन होंगे और दोपहर में 1 से गजरथ फेरी शुरू हो जाएंगी सात फेरे लगभग 2 घंटे में होंगे। गजरथ पर प्रमुख पात्र श्री जी की प्रतिमा को लेकर के बैठेंगे। पहले मुनिसंघ, आर्यिका संघ उसके बाद ब्रह्मचारी भैया, बहने फिर 3 गजरथ और उसके उपरांत इंद्र, इंद्राणियां महिला मंडल, पुरुष मंडल, विभिन्न सेवादलों के सदस्य दिव्यघोष आदि के अलावा जनप्रतिनिधि समाजसेवी और अन्य लोग गजरथ फेरी में चलेंगे।
पांचवें दिन ज्ञानकल्याणक के अवसर पर सुबह 6 बजे से ,पात्र शुद्धि, अभिषेक, शान्तिधारा, नित्यमह पूजन, तपकल्याणक पूजन शान्ति हवन, आचार्यश्री जी की पूजन एवं प्रवचन हुए। 8.30 बजे से नवदीक्षित महामुनिराज की आहारचर्या (पंचाश्चर्य) हुई।
दोपहर 1.30 बजे से ज्ञान कल्याणक की आंतरिक संस्कार क्रियाएं होने के बाद प्राणप्रतिष्ठा के लिए मुनि महाराजो ने सभी प्रतिमाओं में सूरि-मंत्र दिया। केवल ज्ञानोत्पत्ति समवशरण रचना, केवलज्ञान कल्याणक पूजन के पश्चात श्रीजी की दिव्यदेशना (ध्वनि खिरी) हुई। शाम को संगीतमय महाआरती, शास्त्र प्रवचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।
6 माह बाद मिली विधि...
मुनि श्री वृषभसागर महाराज का पडगाहन हुआ 6 माह बाद इक्षुरस की विधि मिली, राजा सोम बने राकेश दिवाकर और राजा श्रेयांश बने अरविंद कर्रापुर के चौके में महाराज का पडगाहन हुआ। बाल ब्रह्मचारी विनय भैया बंडा सिर पर प्रतिमाजी को लेकर पडगाहन पर निकले थे। सभी छुल्लक महाराजो ने मुनि श्री वृषभसागर महाराज को दिए आहार दिए। सैकड़ों लोगों ने महाराज जी को इच्छुरस से आहार कराया।
जब भगवान का जन्म होता है तो नरक में भी शांति छा जाती है- मुनि श्री प्रशस्त सागर महाराज

मुनि श्री प्रशस्त सागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि पूरे पंचकल्याणक में ढाई दिन तक आदिकुमार मनुष्य और इंद्रो के साथ रहे और बाद के ढाई दिन वैराग्य से लेकर मोक्ष तक मुनि महाराजो के साथ रहे। मुनि श्री ने कहा की जब भगवान का जन्म होता है तो नरक में भी शांति छा जाती है आदि कुमार ने सब कुछ त्याग कर मुनि दीक्षा ली उन्हें जब पता चल गया कि इस संसार में सब नश्वर है तो उन्होंने सबसे संबंध विच्छेद कर लिए, जीवन में विचार उत्पन्न होते हैं और फिर उन विचारों के माध्यम से ही बैराग का रास्ता मिलता है आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जब निकलते हैं तो लोग उनके पीछे दीवानों जैसे घूमते हैं और दर्शन करते हैं इस संसार में संसारी प्राणी दीनहीन है और प्रति समय वह पंचइंद्री के बस में है और उन्हें हमेशा लोक लाज का भय है इसीलिए वे मुनि नहीं बन सकते हैं मुनि बनना है तो मन में विकार नहीं होना चाहिए और जो मुनि बन जाते हैं उन्हें लोकलाज का डर नहीं रहता और वो दिगंबर होकर भी दूसरों को रास्ता दिखाने में आगे रहते हैं।

न्यूज सोर्स-मुकेश जैन ढाना सागर

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