आलेख
मनोज कुमार द्विवेदी अनूपपु्र
मां के गर्भ मे 9 माह पलने और जन्म लेने की खुशियों से शरीर त्याग कर अनंत यात्रा पर निकल पडने के मध्य की यात्रा को जीवन कहते हैं। जब तक जीवन का दायित्व माता – पिता के कंधों पर होता है ,तब तक जीवन अबोध ,निर्दोष और उन्मुक्त होता है। पुत्र से पति और पुत्री से पत्नी बनने के बाद दांपत्य जीवन मे प्रवेश करते ही जिम्मेदारियों से भरा गृहस्थ जीवन शुरु होता है और इसके साथ ही परिवार और समाज में भूमिकशें भी बदल जाती हैं।
भारतीय संस्कृति और परंपराओं में संयुक्त परिवार का बडा महत्व रहा है। संयुक्त परिवार का अर्थ किसी व्यक्ति के माता – पिता, उसके पुत्रों – बहुओं और नाती – पोतों से भरा पूरा परिवार से लगाया जाता है। 1990 के दशक से थोडा पहले तक संयुक्त परिवार की अवधारणा बिल्कुल सामान्य थी और भारतीय परिवेश मे हर जगह देखे जा सकते थे।
इसके बाद का समय तेजी से बदलता गया। एक या दो बच्चों ( जिनमे एक लडका ,एक लडकी, दो लडके या दोनो ही लड़कियां ) का परिवार कब एक बेटे या एक बेटी के खतरनाक दौर मे आ सिमटा ,यह पता ही नहीं चला। अब हुआ यह कि उच्च शिक्षा, कमाऊदार नौकरी की लालसा मे बेटा और बेटी जिस देश ,जिस शहर मे गये तो वहीं के हो कर रह गये।
घर से बाहर पढने गया बेटा वहां नौकरी करते – करते नौकरी करमे वाली पत्नी ले आया ,यह बात अब वीडियो कालिंग से माता – पिता को पता चलती है।
बेटा या बेटी मे संस्कार के थोडे जीवाणु शेष बचे रह गये तो वह ” मैं शादी कर रहा हूं / रही हूं ” बताने की औपचारिका निभा लेता है । और तब यहां से पति – पत्नी और एक बच्चे वाले एकल परिवार की परंपरा जन्म लेती है।
अब ऐसे किस्से आम हो गये हैं कि फलाने का बेटा अमरीका मे है और ढिमाके की बेटी – दामाद लंदन मे हैं । किसी को कोई फर्क नही पडता कि विदेश जा बसा किसकी कौन सी औलाद कितना कमा रही है । समाज तब विचलित होता है , तब परेशान हो उठता है ,जब उसे इन्दौर जैसी घटनाओं से दो – चार होना पडता है। बेटा – बहू विदेश मे लाखों कमा रहे हैं और जिसने उन्हे बडे अरमान से पढा लिखा कर इस योग्य बनाया , उसकी लाश बन्द कमरे मे पडे – पडे सड गयी ,उसमे कीडे पड गये। लाश के साघ बन्द घर मे बूढी मां के शव के साथ हफ्तो बाद जब पिता की सडी गली लाश को नगर निगम, पुलिस और मोहल्ले के लोगों ने निकाला तो ना कमाऊ पूत साथ था और ना ही परिवार का कोई व्यक्ति।
यह एकल परिवार का अभिशाप है। असीमित लालसाओं मे घिरा व्यक्ति इतने दूर भविष्य की योजनाओं को संवारने मे लिप्त हो जाता है कि वह “आज को और इस पल” को जीना ही भूल जाता है।
रा़ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कुटुंम्ब प्रबोधन इस दिशा मे उठाया गया एक कदम है।समाज को अब यह समझ लेना होगा कि जब केवल पति कमाता था और पत्नी घर संभालती थी ,तो भले ही आमदनी कम होती थी लेकिन संतानें शिक्षित और संस्कारित होती थी । परिवार के पास परिवार के लिये समय और परवाह दोनों पर्याप्त थे।
आज जब पति पत्नी दोनो बहुत कमा रहे हैं तो उनके पास बच्चों के लिये और बच्चों के पास माता पिता के लिये ना तो समय है , ना ही परवाह और ना ही प्रेम।
जब मम्मी – पापा और बेटा – बेटी के लिये कोई भावना नहीं बची तो बूढे दादा – दादी, नाना – नानी की बात कौन सोचे – विचारे ?
संयुक्त परिवार के क्षरण ने भारतीय समाज को ऐसे विघटनकारी चौराहे पर ला खडा किया है कि जहां अंधी दौड, आपाधापी भरी जिन्दगी असमय खतम हो रही है।
समाज विचार करे, चिंतन – मनन करे और कोशिश करे कि हम कैसे स्वयं से प्रेम करते हुए आज को पूर्ण जीवन मान कर खुश रहना सीख लें और खुशियों को बांटने ,सींचने और उगाने का तरीका स्वीकार कर लें।
– लेखक अनूपपुर के वरिष्ठ पत्रकार हे।