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इतिहास और प्रकृति का संगम: गढ़ाकोटा आज भी समेटे है शाही विरासत

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रिपोर्ट धीरज जॉनसन दमोह

जिले की पथरिया तहसील सीमा से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सागर जिले के गढ़ाकोटा का रमना क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक धरोहरों के कारण एक विशिष्ट पहचान रखता है। दमोह से सागर की ओर जाने वाला सड़क मार्ग इस रमणीय स्थल तक सहज पहुंच प्रदान करता है।


घने जंगलों से घिरा रमना क्षेत्र न केवल अपनी हरियाली से मन मोह लेता है, बल्कि यह वन्यजीवों और परिंदों का सुरक्षित आश्रय स्थल भी है। यहां स्वतंत्र रूप से विचरण करते वन्यजीवों के लिए पर्याप्त जलस्रोत और प्राकृतिक वातावरण उपलब्ध है, जिससे यह क्षेत्र जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है।


वन भूमि पर स्थित एक आकर्षक ब्रिटिश कालीन भवन आज भी ध्यान खींचता है। यह भवन रेस्ट हाउस के रूप में जाना जाता था। स्थानीय निवासी श्याम बिहारी दुबे के अनुसार, यह स्थान अत्यंत शांत और मनोहारी है, जहां निकट से बहती नदी, विविध वृक्ष और वन्यजीवों को एक साथ देखना सुखद अनुभव प्रदान करता है जहां प्राचीन बावड़ी,कुएं और अन्य धरोहर है।यहां से कुछ दूर मर्दनसिंह ने रहस का मेला स्थापित किया था,जो बाद में पशुओं का मेला और प्रदर्शनी में तब्दील हुआ।


रमना क्षेत्र के समीप ही एक प्राचीन बावड़ी स्थित है, जिसके निर्माण का श्रेय राजा मर्दन सिंह जूदेव को दिया जाता है। बावड़ी के भीतर तीनों ओर से घुमावदार सीढ़ियां बनी हुई हैं। इसके एक ओर बरामदा तथा दोनों ओर दो कमरे हैं। ऐसा कहा जाता है कि एक कमरे से सुरंग के माध्यम से गढ़ाकोटा के किले तक मार्ग जाता था, जबकि दूसरे कमरे से राजा द्वारा निर्मित शिकारगाह तक पहुंच होती थी, जो वर्तमान में पूर्णतः क्षतिग्रस्त हो चुकी है। बावड़ी में संचित जल आज भी भू-जल संरक्षण और पेयजल उपयोग का सशक्त उदाहरण है।

इस क्षेत्र में कुछ दूरी पर महल के अवशेष भी दिखाई देते हैं, जिन्हें राजा मर्दन सिंह द्वारा ग्रीष्मकालीन निवास के रूप में बनवाया गया बताया जाता है। इतिहास के पन्नों में दर्ज जानकारी के अनुसार, यहां एक मीनार भी थी, जिसकी घुमावदार पत्थर की सीढ़ियों से रानी शीर्ष पर पहुंचकर सागर और दमोह के दीपों का दृश्य देखती थीं। वर्तमान में यह स्थल खंडहर में परिवर्तित हो चुका है, लेकिन इसकी कहानी आज भी रोमांचित करती है।


गढ़ाकोटा की सबसे प्रमुख पहचान यहां का विशाल किला है, जो सुनार और गदेरी नदियों के मध्य ऊंची भूमि पर स्थित है। यह किला पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके बुर्ज, दीवारें और आंतरिक संरचनाएं आज भी काफी हद तक सुरक्षित हैं। किले की दीवारें और मेहराब अपनी स्थापत्य कला से प्रभावित करती हैं। किले की ऊंचाई से दोनों नदियों का संगम और नगर का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है।

स्थानीय बुजुर्ग हरीश सिंह ने बताया कि यहां का इतिहास काफी विस्तृत है जहां संग्राम हुए। खेती के दौरान उन्हें यहां से तोप के गोले भी प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र के सैन्य इतिहास की पुष्टि करते हैं।प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक विरासत और शांत वातावरण से भरपूर रमना और गढ़ाकोटा, भ्रमण योग्य है।

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