मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
सरार और बरजोर पुर में रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाया जाने वाला भुजरिया पर्व जिले भर में रविवार को महिला एवं युवतियों ने धूमधाम से मनाया। नदिया, जलाशय एवं तालाबों पर भुजरियाओं का विसर्जन मांगलिक गीत गाकर किया। इस दौरान महिलाओं ने अच्छी बारिश, उन्नत फसल एवं हरियाली और परिवार में सुख समृद्धि की कामना की। सरार सरपंच नरेश चौधरी द्वारा जितनी भी महिलाए, कन्याएं अपने सर पर भुजरियों की टोकरी रखे हुए थी उन सभी को पैसा देकर उनके पैर पढ़कर आशीर्वाद लिया।

पुरुषों द्वारा लहंगी का नृत्य किया गया। इस लहंगी के खेल में पुरुष अपने एक हाथ में छोटा डंडा लेकर एक-दसरे के सुर में सुर मिला कर गीत गाते गाते नाचते रहते हैं इस अवसर पर महिलाएं बच्चे और ग्राम के अनेकों गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। शाम को तालाब में भुजरिया विसर्जित करने के बाद घर से एक व्यक्ति मंदिर में जाकर भगवान के चरणों में भुजरिया रखने के बाद गांव वालों को भुजरिया देते हैं बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं छोटों को स्नेह करते हैं यह सिलसिला रात 12 बजे तक चलता रहा।
भुजरिया पर्व रक्षाबंधन के त्यौहार के दूसरे दिन मनाया जाता है। भुजरियां पर्व में भुजरिया का महत्व होता है यह गेहूं के पौधें होते है जिसे जल में प्रवाहित करते है। सावन के महीने की अष्टमी और नवमीं को छोटी- छोटी बांस की टोकरियों में मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं या जौ के दाने बोए जाते हैं। इसके बाद इन्हें रोजाना पानी दिया जाता है। सावन के महीने में इन भुजरियों को झूला देने का रिवाज भी है। इस भुजरिया को उगने में एक सप्ताह लग जाता है। सामान के दूसरे दिन इन भुजरियों का जल स्त्रोतों में विसर्जन किया जाता है। भुजरियां पर्व के दिन गेहूं के हरे इन पौधों यानि भुजरिया की प्रवाहित करने से पहले पूजा की जाती है इसके चारों घूमकर लोकगीत गाए जाते है। इस दौरान कामना की जाती है, कि इस साल बारिश बेहतर हो जिससे अच्छी फसल मिल सकें।
भुजरियों के दिन गांव के युवा ,बुजुर्ग , बच्चे लेगी खेलते हैं जिसमें युवा अपने हाथों में डंडा लेकर गाते , नृत्य करते हुए लेगी खेलते हैं।
महिलाएं इन टोकरियों को सिर पर रखकर जल स्त्रोतों में विसर्जन के लिए ले जाती हैं। जल से प्रवाहित करने के दौरान कुछ भुजरिया को साथ लाकर एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद देते हैं। यह पर्व नई फसल का प्रतीक माना जाता है।