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केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के.शैलजा का पुरस्कार ठुकराना कितना सही ?-अजय बोकिल

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रेमन मेगसेसे अवॉर्ड फिलिपींस के बेहद लोकप्रिय राष्ट्रपति रहे रेमन डेल फिरेरो की स्मृति में दिया जाता है। मैग्सेसे 1953 से साल 1957 तक राष्ट्रपति रहे। एक विमान हादसे मे उनकी मृत्यु हो गई। मैग्ससे एक गरीब परिवार से थे और उन्होंने फिलिपनींस के गरीबों के लिए काफी काम किया। उनकी छवि ईमानदार नेता की थी।

किसी प्रतिष्ठित अवॉर्ड को ठुकराना ज्यादा साहस और आदर का काम है या फिर उसे स्वीकारना ? खासकर तब जबकि वो बिना किसी जोड़ तोड़ या जुगाड़ के ऑफर किया गया हो? पुरस्कार को ठुकराना अपने उसूलों से समझौता नहीं करना है या फिर पुरस्कार और उसके पीछे निहित भावना का अनादर है? इन सवालों का पूर्ण समाधानकारक उत्तर देना कठिन है। क्योंकि इस मुद्दे के दोनो पहलू हैं।
अवॉर्ड ठुकराया
फिलहाल ये सवाल फिर से इसलिए गर्मा गए हैं, क्योंकि केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और वरिष्ठ माकपा नेता के.के.शैलजा ने फिलिपींस का प्रतिष्ठित मेगासेसे अवॉर्ड ठुकरा दिया है। पुरस्कार को पूरी विनम्रता से अस्वीकार करते हुए शैलजा ने कहा कि वे पार्टी के निर्देश पर इसे अस्वीकार कर रही हैं। कहा जा रहा है कि शैलजा पुरस्कार न लें, यह फैसला पार्टी का एकमत से लिया गया था। हालांकि इस बात की भी चर्चा रही कि शीर्ष स्तर पुरस्कार को ग्राह्य करने या न करने को लेकर दो रायें थीं।समर्थक धड़े का मानना था कि पुरस्कार स्वीकार करने से दुनिया भर में यह संदेश जाता कि कोविड काल में लेफ्टे फ्रंट सरकार ने कितना अच्छा काम किया। शैलजा उस वक्त राज्य की स्वास्थ्य मंत्री थीं। लेकिन राज्य में पिछले साल हुए विधानसभा में लेफ्ट फ्रंट के लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटने के बाद शैलजा को पुन: स्वास्थ्य मंत्री तो दूर मंत्री तक नहीं बनाया गया। अब वे सामान्य विधायक के रूप में काम कर रही हैं।

इसी के साथ यह भी हकीकत है कि कोविड 19 की पहली लहर का कारगर तरीके से मुकाबला करने वाले केरल में कोविड की दूसरी और तीसरी लहर का भयावह असर हुआ। पार्टी के इस फैसले को कुछ लोगों ने शैलजा की बढ़ती लोकप्रियता पर ‘राजनीतिक लगाम’ लगाने के रूप में देखा तो कुछ की निगाह में यह शैलजा की पार्टी और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा ही है कि उन्हें जब जो जिम्मेदारी सौंपी गईं, उन्होंने उसे बिना किसी संकोच के पूरा किया और कर रही हैं।
क्यों दिया जाता है ये अवॉर्ड?
रेमन मेगसेसे अवॉर्ड फिलिपींस के बेहद लोकप्रिय राष्ट्रपति रहे रेमन डेल फिरेरो की स्मृति में दिया जाता है। मैग्सेसे 1953 से साल 1957 तक राष्ट्रपति रहे। एक विमान हादसे मे उनकी मृत्यु हो गई। मैग्ससे एक गरीब परिवार से थे और उन्होंने फिलिपनींस के गरीबों के लिए काफी काम किया। उनकी छवि ईमानदार नेता की थी।

फिलीपींस पर जापानी कब्जे के दौरान ही कम्युनिस्ट आंदोलन की शुरूआत हुई। जिसे हुक आंदोलन के नाम से जाना जाता है। जापानियों के जाने के बाद हुक आंदोलनकारी फिलिपींस के किसानों के हक में लड़ाई में जुटे। कहते हैं कि मैग्सेसे ने इन हिंसक आंदोलनकारियों का दमन किया। मैग्सेसे अमेरिका के भी बेहद करीब थे।

संक्षेप में समझें तो कम्युनिस्ट पार्टी का मानना है कि जिस शख्सियत ने उनकी विचारधारा को मानने वालों का दमन किया हो, उसके नाम पर पुरस्कार लेना नैतिक आधार पर सही नहीं है। खुद शैलजा ने भी अवॉर्ड को नकारते हुए कहा कि ‘इस सम्मान के लिए पूरे आदर के साथ मैंने लिखा है कि मैं इसे कुछ राजनीतिक वजहों से स्वीकार नहीं कर सकती, क्योंकि ये सामूहिक काम है। एक व्यक्ति के तौर पर मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकती हूं।”

इन तीन कारणों से पार्टी ने किया मना
पार्टी ने शैलजा को अवॉर्ड लेने से क्यों मना किया, इस बारे में पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी का कहना है कि यह फैसला तीन कारणों से किया गया। उनके मुताबिक़ पार्टी का मानना है कि जन-स्वास्थ्य के कामों में पूर्व मंत्री शैलजा की सफलता केवल उनकी नहीं है. ये केरल सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय के सभी लोगों की मिली-जुली सफलता है. इसके लिए किसी एक को श्रेय नहीं दिया जा सकता। पार्टी ने दूसरी दलील ये दी है कि ये अवॉर्ड किसी भी एक्टिव राजनेता को नहीं दिया गया है।

शैलजा सीपीएम की सेंट्रल कमेटी की सदस्य हैं, जो पार्टी की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है। यानी वो राजनीति में अभी भी सक्रिय हैं। सम्मान स्वीकार ना करने के पीछे पार्टी की तीसरी दलील ये है कि ये सम्मान फ़िलीपींस के जिस नेता रेमन मैग्सेसे के नाम पर दिया जाता है, उनका वामपंथियों के क्रूर उत्पीड़न का इतिहास रहा है।
इनकी याद में ये अवॉर्ड
रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड की स्थापना 1957 में फ़िलीपींस के सातवें राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे की याद में की गई थी, ताकि एशिया में सुशासन या सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में चल रहे अच्छे काम को सम्मानित किया जा सके। इस पुरस्कार की स्थापना में अमेरिका की रॉकफ़ेलर सोसाइटी का भी योगदान है। इसे एशिया का नोबल पुरस्कार भी कहा जाता है।

पिछले 60 सालों में यह यह पुरस्कार तीन सौ से ज़्यादा व्यक्तियों और संगठनों को दिया गया है। 2008 तक ये पुरस्कार छह श्रेणियों – सरकारी कामकाज में योगदान, समाज सेवा, सामुदायिक नेतृत्व, पत्रकारिता-साहित्य-कला, शांति एवं अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के क्षेत्र में काम करने वालों को दिया जाता था।
फिर जोड़ी गई ये श्रेणी
बाद में इसमें एक श्रेणी और जोड़ी गई, जिसमें 40 साल या उससे भी कम उम्र के वो लोग जिन्होंने अपने समाज के लिए उल्लेखनीय काम किया हो और जो बाकी दुनिया के लिए अल्पज्ञात हो, उन्हें भी यह पुरस्कार दिया जाता है। इस पुरस्कार के लिए नामांकन की एक विधिवत प्रक्रिया है। नामांकन प्रक्रिया गोपनीय रहती है। पुरस्कृत हस्तियों की घोषणा मैग्सेसे के जन्म दिन 31 अगस्त को की जाती है।

जहां तक वामपंथियों की बात है तो ऐसे कई उदाहरण हैं, जब उन्होंने पुरस्कार सैद्धांतिक या राजनीतिक कारणों से ठुकराएं हों। हालांकि इससे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी हो और पुरस्कार की कम हुई हो, ऐसा नहीं लगता। क्योंकि पुरस्कार हमेशा प्रलोभन नहीं होता, वह आपके काम और अवदान की लोकस्वीकृति भी होता है। लेकिन वामपंथी शायद ऐसा नहीं मानते।

इसी साल पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने मोदी सरकार द्वारा पद्म भूषण पुरस्कार ठुकरा दिया था। इसी तरह बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी सरकार द्वारा दिए जाने वाले बंग भूषण पुरस्कार को न लेने की अपील माकपा नेता सुजान चक्रबर्ती ने नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बंदोपाध्याय से की थी।

महान फ्रेंच लेखक ज्यां पाल सार्त्र ने तो साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी यह कहकर ठुकरा दिया था कि वो ऐसा कोई अलंकरण लेना नहीं चाहते। अब सवाल यह है कि शैलजा ने पुरस्कार को स्वेच्छा से नकार दिया या फिर उन पर पार्टी का भारी ‘दबाव’ था। कई लोगों की निगाह में यह माकपा का एक और ‘गलत’ फैसला है।
ट्वीट में क्या लिखा है?
वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त ने ट्वीट किया कि शैलजा की पार्टी ‘इनसेक्योर बॉयज़ क्लब’ की तरह व्यवहार कर रही है। वैसे माकपा की यह पहली ‘गलती’ नहीं है। 1990 में जब देश में वी.पी.सिंह सरकार गिरी थी, तब नेता प्रतिपक्ष राजीव गांधी ने मूर्धन्य माकपा नेता और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देने की पहल की थी। लेकिन पार्टी ने बसु को बंगाल छोड़ने नहीं दिया।

यह भी सच है कि विचारधारा के प्रति निष्ठा और आस्था होनी चाहिए, लेकिन समय के साथ जरूरी बदलावों की उपेक्षा आपको पीछे ठेलती जाती है। कभी विपक्ष की बड़ी राजनीतिक शक्ति रही कम्युनिस्ट पार्टियां आज हाशिए पर है। उनकी सत्ता अब केरल तक सिमट कर रह गई है। जिस बंगाल पर उन्होंने तीस साल तक राज किया, वहां भी अब वो हाशिए पर हैं। शैलजा का पुरस्कार ठुकराना सैद्धांतिक रूप से सही हो सकता है, व्यावहारिक दृष्टि से प्रतिगामी फैसला ही कहा जाएगा।

लेखक राजधानी भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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